कर्नाटक में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई

लेखक- हिमांशु तिवारी

कर्नाटक में लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर जो कुछ हो रहा है उसे कर्नाटक तक सीमित कर देखना सही नहीं होगा। दरअसल यह राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई है। इसका असर भी दिखाई देने लगा है। बिहार में आरजेडी सरकार बनाने का दावा कर रही है। तेजस्वी यादव का कहना है कि विधानसभा में उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है इस नाते उन्हे सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिए। गोवा और मणिपुर में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने का दावा कर रही है। कर्नाटक का असर लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। अभी तक कांग्रेस पार्टी नोटबंदी और जीएसटी पर मोदी सरकार पर घेरती थी अब उसके पास कर्नाटक एक मुद्दा होगा। इस ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल कांग्रेस पार्टी छोटे दलों को अपने पाले में करने के लिए भी करेगी।

जहां तक सवाल राज्यपाल की भूमिका को लेकर है तो यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी विपक्षी दल समय समय पर अपने नफा नुकसान को ध्यान में रखकर अलग अलग राज्यों में राज्यपाल की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं। आज कांग्रेस पार्टी के नेता सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला को लेकर हमलावर है ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस के कार्यकाल में राज्यपाल के उपर भेदभाव के आरोप नहीं लगे है। अगर हां तो आज इतना हंगमा क्यों? गोवा, मणिपुर और मेघालय के राज्यपाल ने अपने विवेक से क्या फैसला लिया इस बात को कर्नाटक से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है। क्योंकि विवेकाधिकार कोई कानून नहीं होता है। यह एक व्यक्तिगत फैसला है जो हालात और कानून को ध्यान में रखकर लिया जाता है। यह फैसला व्यक्ति दर व्यक्ति एक हो यह जरूरी नहीं है। चुनाव में अगर किसी एक पार्टी को बहुमत मिलता है या फिर चुनाव पूर्व हुए गठबंधन को बहुमत मिलता है तो राज्यपाल को अपने विवेकाधिकार के इस्तेमाल की आवश्यक्ता नहीं पड़ती है। लेकिन त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल के पास विवेकाधिकार के अलावा कोई और विकल्प नहीं होता है। राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी या फिर चुनाव बाद हुए गठबंधन में से किसी एक को सरकार बनाने के लिए बुलाने के लिए स्वतंत्र है। ऐसे में राज्यपाल जिस किसी दल सरकार बनाने के लिए न्योता देते है वो दल राज्यपाल के फैसले को लोकतंत्र की जीत और दूसरा दल लोकतंत्र की हत्या बताने से नहीं चूकता है।

मौजूदा समय में एक तरफ बीजेपी के नेता राज्यपाल वजूभाई वाला के फैसले को लोकतंत्र के हित में उठाया गया कदम बता रहें हैं तो वहीं कांग्रेस पार्टी इसे लोकतंत्र की हत्या साबित करने में जुट गई है। सुप्रीम कोर्ट से सड़क तक कांग्रेस पार्टी के नेता हर मोर्चे पर लोकतंत्र की लड़ाई लड़ते दिख रहे हैं। साबित करने की कोशिश की जा रही है कि बीजेपी राज्यपाल के सहारे कर्नाटक में सत्ता हासिल करना चाहती है। दोनों ही दलों के अपने अपने तर्क है, लेकिन किसी भी दल ने बहुमत का दावा देर रात सुप्रीम कोर्ट में पेश नहीं किया। बीजेपी की तरफ से पेश हुए वकील ने खुलकर नहीं कहा कि बहुमत कहां से आएगा और ना ही कांग्रेस- जेडीएस की तरफ से पेश हुए अभिषेक मनु सिंघवी विधायकों की सूची कोर्ट के सामने रख पाए। जो इस बात के संकेत है कि दोनों पक्ष बहुमत के नाम पर खुलकर सबूत पेश करने की स्थिति में नहीं है।

इतिहास गवाह है लोकतंत्र में नैतिकता की दुहाई देने वाले राजनीतिक दल अपने सत्ता सुख के लिए किसी भी विरोधी के साथ हाथ मिला लेते है। कर्नाटक की स्थिति में भी यही हुआ। त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर सत्ता सुख के लिए एक मंच पर आ गए। सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बीजेपी ने सरकार बनाने का दावा ठोक दिया। जैसे ही राज्यपाल ने बीजेपी को सरकार बनाने के लिए न्योता दिया कांग्रेस और जेडीएस बुरा मान गई। राज्यपाल के फैसले के खिलाफ कांग्रेस पार्टी उस चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के पास गई जिसके खिलाफ चंद दिनों पहले महाभियोग लाया था। ये न्याय का तकाजा ही है कि आधी रात को चीफ जस्टिस ने तीन जजों के एक बेंच का गठन किया और रात दो बजे इस मामले पर सुनवाई शुरू हुई। करीब चार घंटे के बहस के बाद यदियुरप्पा के शपथ ग्रहण समारोह पर रोक तो नहीं लगी लेकिन शुक्रवार को साढ़े दस बजे कोर्ट ने 24 घंटे में बहुमत साबित करने के आदेश सुनाया। कर्नाटक का नाटक बैंगलुरू से सुप्रीम कोर्ट होते हुए वापस एक बार फिर बैंगलुरू पहुंच गया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी शनिवार शाम 4 बजे सदन में अपना बहुमत सिद्ध कर पाती है या नहीं। पहली नजर में बीजेपी के पास पर्याप्त संख्याबल नहीं है। लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता है।




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