बीजेपी की राह में मुश्किलें

लेखक- हिमांशु तिवारी

आम चुनाव में एक साल से भी कम वक्त बचा है। अगला आम चुनाव कौन जीतेगा, सरकार किसकी बनेगी, देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। इन तमाम सवालों को लेकर सियासी गलियारों से लेकर गांव के चौराहों तक, मीडिया हाउस से लेकर सोशल मीडिया तक देशभर में मंथन का दौर जारी रहा है। कोई मोदी सरकार को देश के इतिहास का सबसे बेहतर सरकार बता रहा है तो कोई देश की जनता के साथ छल बता रहा है। इस बीच सीएसडीएस के सर्वे ने 2019 में एनडीए की सरकार बनने का दावा किया है। हालांकि इस सर्वे में बीजेपी को भारी नुकसान होता दिखाया गया है। यानी बीजेपी अपने दम पर सरकार बनाने में सक्षम नहीं है।
बीते चार सालों में देश और समाज के विकास के लिए सरकार की तरफ से कई ठोस कदम उठाए गए हैं। जनहित की योजनाओं को लागू किया गया है। इसके बावजूद बीजेपी का ग्राफ गिरना इस बात के संकेत है कि सरकार कुछ मोर्चों पर जनता का दिल जीतने में नाकाम रही है। इस फेहरिस्त में सबसे पहला स्थान रोजगार का है। रोजगार के मुद्दे पर मोदी सरकार के पास कोई ठोस जवाब नहीं है। अपनी घोषणापत्र में बीजेपी ने हर साल दो करोड़ रोजगार देने का वादा किया था। रोजगार के बाद दूसरा नंबर आता है कालेधन का। 2014 के लोकसभा चुनाव में कालेधन का मुद्दा बहुत गरमाया था। खासकर विदेशों में जमा कालेधन को लेकर काफी हंगामा मचा था। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद एसआईटी का गठन किया। दूसरे देशों के साथ मिलकर इस दिशा में काम भी किया लेकिन अभी भी सरकार के पास दो टूक जवाब नहीं है कि विदेश में कितना कालाधन जमा है और वो कब तक वापस आएगा। विपक्ष इसी बात का फायदा चुनाव में उठाएगा।
कश्मीर और पाकिस्तान के मोर्चे पर विपक्ष सरकार पर हमलावर है। इन दोनों मोर्चों पर मोदी सरकार ने काम तो किया है लेकिन जनता के बीच एक स्पष्ट मैसेज देने में कही कमी रह गई है। सीमा पार पीओके में आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल अटैक और घाटी में नोटबंदी और सैन्य अभियान चलाकर आतंकवाद और अलगाववाद की कमर तोड़ने में काफी हद तक सफलता मिली है। इसके बावजूद सीमा पर गोलीबारी और घाटी में पत्थरबाजी की घटनाएं पूरी तरह से बंद नहीं हुई है। जिसे विपक्ष सीधे तौर पर सरकार की नाकामी बता रहा है।
जीएसटी और नोटबंदी का फैसला मोदी सरकार का एक साहसिक कदम था जिसके तात्कालिक फायदे कम और दूरगामी परिणाम ज्यादा होंगे। सरकार के इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में बीजेपी को सफलता मिली। पार्टी जीएसटी और नोटबंदी के फैसले को सरकार सफल बता रही है लेकिन विपक्ष एक बार फिर लोकसभा चुनाव में इसे भुनाने की कोशिश करेगा। नमामी गंगे परियोजना और आदर्श ग्राम योजना अपने उद्देश्य को पूरा करने में विफल रही है।
हाल के दिनों में देश में असुरक्षा का माहौल बना है इस बात को साबित करने में विपक्ष सफल रहा है। चाहे वो दलित उत्पीड़न का मामला हो या फिर मुसलमानों का। बीते कुछ दिनों में दलितों के साथ हुए मारपीट की घटनाओं ने मोदी सरकार की दलित विरोधी छवि बनाने का काम किया है। गुजरात चुनाव से पहले जिस तरह से जिग्नेश मेवानी के नेतृत्व में दलित आंदोलन हुए उसे नकारा नहीं जा सकता है। इस चुनावी साल में इस बार फिर इस मुद्दे को मोदी विरोधी हवा देने की कोशिश करेंगे। अखलाक और पहलू खान जैसी घटनाओं को खोजकर निकाला जाएगा और साबित किया जाएगा कि बीजेपी और मोदी मुस्लिम विरोधी है। देश में असुरक्षा का माहौल है, लोकतंत्र खतरे में है।
इस सब के बीच रही सही कसर पेट्रोल और डीजल की कीमतों ने पूरी कर दी है। वक्त रहते इस पर काबू पाने में सरकार सफल नहीं होती है तो 2019 के चुनाव में मुश्किलें खड़ी हो सकती है। 2014 के आम चुनाव से पहले बीजेपी के नेता भी ठीक वैसे ही विरोध प्रदर्शन कर रहे थे जैसा की आज विपक्ष के नेता कर रहे हैं। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें महंगाई को तय करती है और महंगाई से वोट प्रभावित होता है। चुनाव जीतना है तो वोटर का दिल जीतना होगा।




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