शक्ति परीक्षण से पहले यदियुरप्पा का इस्तीफा

लेखक- हिमांशु तिवारी

कर्नाटक के नाटक के पहले चरण का पटाक्षेप हो गया है। बीएस यदियुरप्पा में शक्ति परीक्षण से पहले इस्तीफा दे दिया है। इसके साथ ही अब कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में जेडीएस और कांग्रेस के गठबंधन की सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है। यदियुरप्पा के इस्तीफे का बाद जेडीएस-कांग्रेस के खेमे में खुशी की लहर साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस ने नेता इसे लोकतंत्र की जीत बता रहे है। वहीं बीजेपी के नेता राजनीतिक सुचिता और ईमानदार राजनीति का हवाला दे रहे है।

कर्नाटक की घटनाक्रम पर गौर करें तो साफ हो जाता है कि कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी को उसी की रणनीति में उलझा कर पटखनी दे दी है। इसके साथ ही कांग्रेस पार्टी ने गोवा, मणिपुर और मेघालय का बदला ले लिया है। लोकतंत्र में बदला शब्द का इस्तेमाल सही नहीं माना जाता लेकिन जिस तरह से बीजेपी और कांग्रेस पार्टी के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई चल रही है उसे देखते हुए इसका इस्तेमाल गलत नहीं होगा। कर्नाटक में यदियुरप्पा की हार बीजेपी के कांग्रेस मुक्त भारत के लिए बड़ा झटका है। जिस तरह से कर्नाटक के चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस में जुबानी जंग देखाने को मिला उससे यह साफ था कि कांग्रेस पार्टी कर्नाटक का किला हर कीमत पर बचाना चाहती है। इस खेल में उस वक्त तीखा मोड़ आया जब सोनिया गांधी को चुनाव प्रचार में उतरना पड़ा। सोनिया गांधी का कर्नाटक से चुनाव में उतरना इस बात के संकेत थे कि बीजेपी लीड कर रही है। मोदी की रैली के बाद बीजेपी अपनी जीत को लेकर अति उत्साह में आ गई थी। इसका नजारा चुनावी परिणाम के दिन बीजेपी नेताओं में दिखीं।

बीजेपी और कांग्रेस के बीच वर्चस्व की लड़ाई कर्नाटक में यदियुरप्पा के इस्तीफे के साथ खत्म होता नहीं दिख रहा है। इस दोनों पार्टियों के बीच खुद को लोकतंत्र का असली हमदर्द बताने की होड़ शुरू होगी। मौजूदा समीकरण इस बात की ओर संकेत दे रहे है कि बीजेपी हो या फिर कांग्रेस दोनों ही दलों ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कमर कस ली है। कांग्रेस ने कर्नाटक में सीएम की कुर्सी छोड़कर छोटे दलों में विश्वास जगाने का काम किया है। वहीं पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश देने में सफल रही है कि अब पहले वाली स्थिति नहीं है। हाईकमान जमीनी स्तर पर हर चुनौती स्वीकार करने को तैयार है। बीजेपी के नेता कांग्रेस मुक्त भरात की बात करते है। वहीं कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकार अब किसी भी कीमत पर बीजेपी को रोकने के लिए तैयार है।

कर्नाटक में जिस तरह से जेडीएस को समर्थन देकर बीजेपी को रोकने का काम किया उससे एक बात साफ है कि आने वाले दिनों में मोदी- शाह की मुश्किलें बढ़ने वाली है। जो कांग्रेस पार्टी कल तक स्लीप मोड में थी वो अब एक्टिव हो गई है। कर्नाटक की घटना क्षेत्रिय दलों को जोड़ने के लिहाज से अच्छा उदाहरण है लेकिन क्या इस फार्मूले के तहत राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बन पाएंगे। सावल इस लिए क्यों कि हाल ही में राहुल ने एक सवाल के जवाब कहा था कि अगर उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव में बड़ी पार्टी बनकर उभरती है तो वो प्रधानमंत्री बनने को तैयार है। राहुल को गठबंधन के इतिहास को भी याद रखना होगा। कांग्रेस पार्टी के पास लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सोनिया गांधी पीएम नहीं बन पाई थी और बाद में उन्हें त्याग की मूर्ति बता दिया गया। देश के इतिहास में कई ऐसे उदाहरण है जहां कम संख्याबल वाली पार्टी के नेता पीएम बने और कांग्रेस पार्टी उनके समर्थन में खड़ी रही है। टीवी चैनलों पर कांग्रेस पार्टी के नेता भले ही दावा कर रहें तो कि 2019 में बॉय बॉय मोदी का नारा लगेगा लेकिन और राहुल गांधी के लिए अभी भी यकीन के साथ कहना मुश्किल होगा कि 2019 में वो केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब होंगे।




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