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संघ मुख्यालय से प्रणब दा के संदेश

लेखक- हिमांशु तिवारी

पूर्व राष्ट्रपति और दिग्गज कांग्रेसी प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय जाने से पहले और उसके बाद के राजनीति में जमीन आसमान का फर्क नजर आता है। जो लोग कल तक प्रणब मुखर्जी को संघ मुख्यालय नहीं जाने या फिर वहां जाने की स्थिति में संघ को नसीहत देने की बातें कर रहे थें वो अब उनके भाषण से अपने काम की बातें तलाशते नजर आ रहे हैं। कल तक इस मुद्दे पर टीवी चैनलों से खुद को अलग रहने वाले कांग्रेस के नेताओं को अचानक से पूर्व राष्ट्रपति के भाषण में सब कुछ अच्छा लगने लगा है। तो वहीं संघ और बीजेपी के नेता पूर्व राष्ट्रपति के इस दौरे और संघ की नींव रखने वाले डॉक्टर के. बी. हेडगवार को भारत मां के महान सपूत बताने को अपनी जीत के तौर पर पेश कर रहे हैं। प्रणब मुखर्जी के नागपुर दौरे से किसे राजनीतिक लाभ हुआ और किसके लिए यह घाटे का सौदा साबित होगा इस बात को आम आदमी को समझने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा।
संघ मुख्यालय में पूर्व राष्ट्रपति के भाषण में कुछ भी ऐसा नहीं था जो सीधे तौर पर राष्ट्रीय स्वयं संघ के खिलाफ और कांग्रेस के पक्ष में जाता हो। अगर इसे मौजूदा दौर की राजनीति पर कटाक्ष कहा जाए तो गलत नहीं होगा। जैसे ही पूर्व राष्ट्रपति ने मंच से कहा “राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रभक्ति को समझने के लिए हम यहां आए हैं। मैं भारत के बारे में बात करने यहां आया हूं।” स्पष्ट हो गया कि वो एक सशक्त भारत की बात करने वाले हैं। एक ऐसे उदार हृदय भारत की बात करने वाले है जिसका एक अपना इतिहास है, एक समृद्ध संस्कृति है और जो वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धांत में विश्वास रखता है। एक ऐसा देश जो मौजूदा दलगत राजनीति से कहीं ज्यादा बड़ा और समृद्ध है। जिसे संवारने और संजोए रखने की आवश्यक्ता है। दरअसल प्रणब मुखर्जी का भाषण किसी के पक्ष या विपक्ष में नहीं बल्कि देश हित में कही गई बातों का संग्रह है। जिससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है लेकिन वार रे देश की राजनीति उधर भाषण खत्म हुआ और फिर शुरू हो गया मतलब की राजनीति का खेल। एक तरफ दादा ने राष्ट्रवाद क्या है बताया वहीं उन्होंने नफरत की राजनीति पर भी प्रहार किया। राष्ट्र किसी एक शख्स या दल का नहीं होता है। यह बात उन पर भी लागू होता हो जो अपना इतिहास देश के स्वतंत्रता संग्राम से जोड़कर बताते नहीं थकते है। यह उन लोगों पर भी लागू होता है जो सारा सारा दिन राष्ट्रवाद की पाठ पढ़ाते नहीं थकते है। मौजूदा राजनीतिक परिवेश में नफरत कौन फैला रहा है इस पर राजनीतिक दल खुद को ईमानदार और दूसरे को दोषी बताते नहीं थकते लेकिन इस खेल में कोई भी दल किसी से कम नहीं हैं। संघ मुख्यालय से प्रणब दा ने देश की राजनीति को आईना दिखाने का काम किया। एक संदेश दिया कि कैसे दो अलग अलग विचारधारा के लोग एक साथ मंच साझा कर लोकतंत्र की खूबसूरती बढ़ा सकते हैं। इसके लिए संघ और दादा दोनों को बहुत बहुत बधाई।
पूर्व राष्ट्रपति के नागपुर दौरे से कांग्रेस की असहजता को एक राजनीतिक भूल कहा जाए तो गलत नहीं होगा। कांग्रेस पार्टी बड़ी ही आसानी से प्रणब दा के इस फैसले को उनका बतौर पूर्व राष्ट्रपति लिया गया एक निजी फैसला बताकर अपनी साख बचा सकती थी। इतना तो विश्वास किया जाना चाहिए था कि प्रणब मुखर्जी जैसा दिग्गज नेता किसी सार्वजनिक मंच से कोई ऐसी वैसी ओछी हरकत नहीं करेगा। लेकिन पूर्वाग्रह की शिकार कांग्रेस प्रणब मुखर्जी पर यकीन नहीं कर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। बीते एक हफ्ते में पार्टी की तरफ से जिस तरह से बयानबाजी हुई है उसकी कोई आवश्यक्ता नहीं थी। अनावश्यक बयानबाजी ने पार्टी के खिलाफ माहौर बनाने का काम किया। प्रणब मुखर्जी की बातों पर गौर किया जाए तो फटकार और सीख दोनों खोमें के लिए है। पूर्व राष्ट्रपति ने देश के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए अपने भाषण कुछ सुझाव दिए है जिसे स्वीकार करना राजनीतिक दलों के लिए मौजूदा हालात में संभव है।




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