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अधीर रंजन चौधरी : बरहमपुर के जनप्रिय नेता

मनोज कुमार तिवारी

नक्सल आंदोलन के जरिए राजनीति में कदम रखने वाले 63 वर्षीय अधीर रंजन चौधरी की छवि बरहमपुर में रॉबिनहुड की है। करिश्माई व्यक्तित्व वाले अधीर ऐसे नेताओं में से हैं जिनकी लाख आलोचना की जाये लेकिन अनदेखी नहीं की जा सकती। जुझारू छवि के अधीर रंजन को कांग्रेस संसदीय दल का नेता बनाये जाने के बाद उन्हें इस मुहावरे का मतलब शायद बखूबी समझ में आ गया होगा कि सब्र का फल मीठा होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उन्हें पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया था।

वे वाम फ्रंट और टीएमसी के साथ किसी भी तरह के तालमेल के सख्त खिलाफ थे। इस कार्रवाई से नाराज चौधरी के भाजपा में जाने की भी अटकलें लगाई गई थी। लेकिन उन्होंने संयम का परिचय देते हुए कांग्रेस का दामन थामे रखा। कांग्रेस ने इस रूप में उन्हें यह इनाम दिया है। प्रणब मुखर्जी के बाद इस पद पर पहुंचने वाले वह बंगाल के दूसरे सांसद हैं। उल्लेखनीय है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में वे कांग्रेस में शामिल हुए थे। उस समय मुर्शिदाबाद आरएसपी का गढ़ माना जाता था।

वर्ष 1991 में पहली बार चुनाव मैदान में उतरे अधीर विधानसभा चुनाव 1400 वोटों से भले ही हार गये थे। लेकिन उनकी सांगठनिक क्षमता, साहस और वाममोर्चा के खिलाफ जुझारूपन ने उनकी लोकप्रियता रातों-रात बढ़ा दी, जो अब तक बरकरार है। 1996 में पार्टी ने उन्हें दोबारा टिकट दिया। लेकिन उस वक्त कांग्रेस में रहीं ममता बनर्जी ने अधीर की उम्मीदवारी का भारी विरोध किया था। उसके बाद से इनके संबंध नहीं सुधरे। कहा जाय कि उनके बीच का रिश्ता सांप और नेवले जैसा है तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।

पार्टी के तमाम नेता इधर से उधर हो गए। लेकिन चौधरी अकेले ऐसे नेता हैं जिन्होंने बीते दो दशकों से अकेले अपने बूते मुर्शिदाबाद जिले को कांग्रेस का अजेय किला बनाए रखा है। यह भी कहा जा सकता है कि उन्हीं की बदौलत बंगाल में सीपीएम, टीएमसी और भाजपा की आंधी में भी अब तक कांग्रेस का झंडा लहरा रहा है। यही कारण है कि खुद प्रधानमंत्री मोदी भी उन्हें फाइटर की संज्ञा देते हुए उनकी सराहना कर चुके हैं।

 




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