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अल्ताफ को मोदी प्रेम पड़ा महंगा

himanshu tiwari

लेखक- हिमांशु तिवारी (वरिष्ठ पत्रकार)

hktiwari009@gmail.com 

एमक्यूएम के नेता अल्ताफ हुसैन को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति लगाव महंगा पड़ता दिख रहा है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत ने अल्ताफ हुसैन विश्वविद्यालय का नाम बदलकर मोहतरमा फातिमा जिन्ना विश्वविद्यालय करने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री मुराद अली शाह की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में विश्वविद्यालय का नाम बदलने का फैसला इस बात के संकेत है कि वहां की सरकार अल्ताफ हुसैन के खिलाफ खुलकर सामने आने के लिए तैयार है। फातिमा जिन्ना पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की बेटी हैं। कुछ दिनों पहले 63 वर्षीय हुसैन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पाकिस्तानी फौज की तरफ से पाकिस्तान में मुहाजिरों के खिलाफ किए जाने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की अपील की थी।

विश्वविद्यालय का नाम बदले जाने की घटना को अल्ताफ के मोदी प्रेम से जोड़कर देखा जा रहा है। एमक्यूएम पाकिस्तान की चौथी सबसे बड़ी पार्टी है और अल्ताफ हुसैन इसके प्रमुख और कद्दावर नेता है। सरकार के इस फैसले को हुसैन और उनकी पार्टी के खिलाफ बढ़ती शत्रुता का संकेत कहा जाए तो गलत नहीं होगा। पाकिस्तानी मीडिया की मानें तो विश्वविद्यालय का नाम बदले जाने के पीछे अल्ताफ हुसैन के पाकिस्तान विरोधी बयान एक प्रमुख कारण है।

अल्ताफ हुसैन के खिलाफ पाकिस्तान की कोर्ट में कई अपराधिक मामले चल रहें है। पाकिस्तान की आतंकवाद विरोधी अदालत ने 2015 में अल्ताफ हुसैन को राष्ट्र विरोधी भाषण देने और हिंसा भड़काने के आरोप में 81 साल जेल की सजा और 24 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने आदेश दिया कि एमक्यूएम प्रमुख की संपत्तियां जब्त की जाएं और उनकी नीलामी हो। अलग-अलग शहरों में अल्ताफ के खिलाफ राष्ट्रद्रोह और हिंसा भड़काने के आरोपों में दर्जनों मामले दर्ज हैं।

मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट के नेता ने पीएम मोदी से गुजारिश की थी कि उन्हें कराची में रहने वाले मुहाजिरों और शरणार्थियों के अधिकारों के पक्ष में बोलना चाहिए। 1992 से लंदन में निर्वासन की जिंदगी गुजर बसर कर रहे अल्ताफ हुसैन चाहते हैं कि जिस तरह भारत बलूचिस्तान में पाकिस्तानी फैज के अत्याचारों के खिलाफ विश्व मंच पर खुलकर बोलता है उसी तरह पीएम मोदी को उसी तरह मुहाजिरों और शरणार्थियों के पक्ष में आवाज उठानी चाहिए।

मुहाजिर उन उर्दूभाषी लोगों को कहा जाता है जो भारत पाकिस्तान के बंटवारे के समय भारत से पाकिस्तान इस उम्मीद में चले गए थे कि पाकिस्तान एक इस्लामिक देश हैं। वहां वो ज्यादा खुश रहेंगें। मुहाजिरों का कहना है कि उनके पूर्वजों ने बंटवारे के समय एक बड़ी भूल की थी वो ये कि वे पाकिस्तान चले गए। उनके पाकिस्तान आने के बाद जो बच्चे पैदा हुए उन्हे कभी भी पाकिस्तानी या माटी के लाल के रुप में यहां के लोगों ने स्वीकार नहीं किया।

पीएम मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किला से राष्ट्र के नाम अपने संबोधित में बलूचिस्तान और पीओके तथा गिलगित में पाकिस्तानी फौज के अतायाचारों का जिक्र किया था जिसके बाद वहां को लोगों ने भारतीय पीएम का जमकर स्वागत किया था। इससे पहले किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इन मुद्दों के सार्वजनिक मंच से नहीं उठाया था। पीएम मोदी का ये कदम पाकिस्तान को विश्व मंच पर कश्मीर मुद्दे पर घेरने की थी। भारत इस मुदद्दे पर कितना कामयाब रहा ये चर्चा का विषय है लेकिन भारतीय पीएम के इस कदम ने पाकिस्तानी नागरिकों के मन में उम्मीद की एक किरण जगा दी है जो वहां के कुशासन के शिकार है। बलूचिस्तान, पीओके, गिलगित और सिंध के उपेक्षित नागरिक भारत की ओर आशा भरी नजरों के देख रहें हैं। उन्हे उम्मीह है कि भारत के प्रधानमंत्री उनके दर्द को समझेंगे और उसे दुनिया के सामने रखेंगे। किसी भी देश के लिए ये एक शर्मनाक स्थिति हो जाती है जब वहां का नागरिक किसी दूसरे देश से मदद की अपील करता है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को इस बात को समझना होगा कि पाकिस्तान किस दिशा में जा रहा है। हालांकि वो कह सकते हैं कि एमक्यूएम नेता का ये बयान राजनीति से प्रेरित है तो क्या मान लिया जाए कि अल्ताफ हुसैन भारत के एजेंड के तौर पर काम कर रहें हैं। खैर ये बातें अल्ताफ ही बेहतर जानते और समझते होंगे।    

पाकिस्तान हर बात पर कश्मीर में भारतीय सेना के अत्याचार की बातें करता है लेकिन हकीकत किसी से छिपी नहीं है। समय समय पर पाकिस्तान में होने वाला विद्रोह इस बात के गवाह है कि वहां की जनता अपनी हुकूमत से खुश नहीं है। अगर एक क्षेत्र मे विद्रोह हो तो कहा जा सकता है कि ये राजनीति से प्रेरित है लेकिन अगर किसी देश के चार या फिर छह हिस्सों में बगावत दिखाई और सुनाई दे तो यह वाकई गंभीर मसला है।    

 




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