साइकिल छोड़ हाथी पर सवार हुए अंसारी बंधु

himanshu tiwari

लेखक: हिमांशु तिवारी (वरिष्ठ पत्रकार)

उत्तर प्रदेश की सियासी दंगल में कभी समाजवादी पार्टी के करीबी रहे अंसारी बंधु एक बार फिर मायावती के साथ आ गए है। मुख्तार की वापसी से बीएसपी को मुस्लिम-दलित समीकरण की गोलबंद में मदद मिलेगी। पूर्वांचल से मुख्तार बीएसपी की झोली में सीटें दिलाने में भले ही कामयाब नहीं हो लेकिन इतना तो तय है कि अंसारी बंधु कई सीटों पर बीजेपी और समाजवादी पार्टी का खेल खराब कर देंगे। मौके की नजाकत को समझते हुए बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अंसारी बंधुओं को टिकट देकर अपने पाले में कर लिया। मऊ वो इलाका है जहां पर अंसारी बंधुओं को डंका बजता है। ऐसे में मायावती मानकर चल रही है कि उनकी दो सीटें पक्की है। दूसरी बात ये कि अंसारी बंधुओं के आने से मुस्लिम वोटरों में बीएसपी की पैठ बढ़ेगी।

लखनऊ में मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो कुछ कहा वो इस बात का प्रमाण है कि मायावती अंसारी बंधुओं के बीएसपी में शामिल होने से काफी खुश है। मायावती ने दावा किया कि मुख्तार की विरोधियों ने उनकी इमेज खराब की है। कभी मुख्तार बीएसपी को छोड़ कर चले गए थे। लेकिन अब पश्चाताप कर लिया है। मुख्तार के परिवार को कृष्णानंद राय के मर्डर के आरोप में जबरदस्तीप फंसाया गया है, कोर्ट में अभी तक उनके खिलाफ कोई भी ठोस सबूत नहीं पेश किया गया है। हत्या का आरोप होने से व्यक्ति अपराधी नहीं हो जाता है। बीएसपी में शामिल होने वालों में मुख्‍तार अंसारी, उनके बेटे और भाई शामिल हैं। बीएसपी ने  मुख्‍तार को मऊ सदर से, उनके बेटे अब्‍बास को घोसी और भाई सिग्‍बातुल्‍लाह अंसारी को मोहम्‍मदाबाद सीट से टिकट देक मैदान में उतारा है। मायावती के साफ कर दिया है कि चुनावी मौसम में मायावती को अंसारी बंधुओं से कोई शिकायत नहीं है। इसकी बड़ी वजह मऊ की वो विधानसभा सीटे है। जो अंसारी बंधुओं के आने से बीएसपी के खाते में आने से अब कोई नहीं रोक सकता है। इस मौके पर अफजाल अंसारी ने कहा कि सपा ने हमें धोखा दिया है। मुलायम सिंह खुद कहते हैं कि अखिलेश यादव मानसिक तौर पर मुस्लिम विरोधी है। पूरे परिवार ने हमें कई बार समाजवादी पार्टी में शामिल कराया, लेकिन अखिलेश विरोध करते रहे। मैं कौमी एकता दल का बसपा में विलय करता हूं। अगर बहन जी ड्यूटी लगाएंगी तो चौकीदार बनकर बीएसपी को जिताऊंगा।

गौरतलब है कि मुलायम और शिवपाल ने समाजवादी पार्टी में कौमी एकता दल का विलय भी करवाया था, लेकिन अखिलेश इसके खिलाफ थे। बाद में जब अखिलेश पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए तो मुख्तार के भाई सिगबतुल्लाह को बुलाकर सपोर्ट करने को कहा गया। अखिलेश ने चुनाव आयोग में अपने सपोर्ट वाले जिन विधायकों का एफेडेविट दिया था उसमें उनका भी नाम था। सिगबतुल्लाह का कहना है कि अखिलेश ने उनसे चुनाव प्रचार करने के लिए कहा था लेकिन इसके बावजूद मऊ सीट पर मुख्तार के खिलाफ अल्ताफ अंसारी को टिकट दिया गया और मोहम्मदाबाद सीट कांग्रेस को दे दी गई। समाजवादी पार्टी में अपनी उपेक्षा से नाराज अंसारी बंधुओं ने साइकिल को छोड़ हाथी की सवारी करना बेहतर समक्षा।

शतरंज की बिसात पर हर चाल सीधी चली जाए ये जरूरी नहीं है। माया की ये चाल साइकिल और कमल दोनों पर भारी पड़ती नजर आ रही है। बीएसपी सुप्रीमो मानकर चल रही है कि अंसारी बंधुओं के सहारे समाजवादी पार्टी के दोहरे चरित्र और सूबे की सांप्रदायिक सौहार्द को खराब करने वाली बीजेपी को रोकने में मदद मिलेगी। लेकिल सवाल ये है कि जिस मुख्तार अंसारी की पहचान यूपी में एक बाहुबली नेता के तौर पर होती है वो बीएसपी के लिए संकटमोचन की भूमिका अदा कर पाएंगे। क्या सूबे के मुसलमान मुख्तार को अपना रहनुमा मान कर बीएसपी को अपना वोट देंगे या फिर बीएसपी के माथे दागी नेता को शरण देने का कलंक लगेगा।




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