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नोटबंदी को लेकर आम आदमी कंफ्यूज

हिमांशु तिवारी

रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के बाद नोटबंदी के फैसले को लेकर विपक्ष ने मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। विपक्ष का आरोप है कि नोटबंदी का फैसला देश हित में नहीं बल्कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए उठाया गया कदम था जिसका नुकसान देश को उठाना पड़ा। उधर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने अपनी किताब में खुलासा किया है कि उन्होंने सरकार के इस कदम का कभी भी समर्थन नहीं किया था। राजन की मानें तो इस फैसले का तत्कालिन नुकसान लंबे समय में होने वाले फायदे पर भारी पड़ेंगे।

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि नोटबंदी के बाद सरकार को 16 हजार करोड़ रुपये मिले और 21 हजार करोड़ रुपये खर्च हो गए, सरकार के अर्थशास्त्री को इस काम के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए। तो वहीं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने नोटबंदी के दौरान हुई लोगों की मौत और आर्थिक नुकसान की जिम्मेदारी सरकार को लेने की मांग की है। वामपंथी नेता सीताराम येचुरी कहते हैं कि 99 फीसदी नोट बैंक में वापस आ गए, नोटबंदी के दौरान सैकड़ों लोगों की जान गई, कई लोगों को अपनी नौकरी गवानी पड़ी, मोदी सरकार के इस एंटी नेशनल काम को देश कभी भूल नहीं पाएगा। विपक्ष की बातों में कोई नयापन नहीं है। नोटबंदी के फैसले के बाद से ही विपक्ष सरकार के इस कदम का विरोध कर रहा है। विपक्ष का पास तर्क देने के लिए 2017-18 की पहली तिमाही के आंकड़े भी मौजूद है। इन आंकड़ों पर गौर करें तो इस दौरान ग्रोथ रेट महज 5.7 फीसदी रहा है जो कि पिछले साल (7.9 फीसदी) की तुलना में काफी कम है। तो क्या यह मान लिया जाए की मोदी सरकार का यह फैसला आनन- फानन में राजनीतिक लाभ के पूर्ति के उठाया गया कदम था।

लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान से ऐसा लगता है कि नोटबंदी का फैसला देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया एक कारगर कदम था और यह फैसला देश हित में है इस बात पर संदेह करने की गुंजाइश नहीं है। विपक्ष कह रहा है नोटबंदी एक फ्लॉप शो है लेकिन जेटली विपक्ष को कंफ्यूज बता रहे हैं। जेटली का दावा है कि विपक्ष नोटबंदी के मूल उद्देश्य को समझ ही नहीं पाया। बैंकिंग सिस्टम में 99 फीसदी पैसा आ गया इसका यह मतलब नहीं है कि वह पैसा पूरी तरह से सफेद है। करीब 10 लाख लोग आयकर विभाग की नजर में है, मामले की जांच हो रही है, दोषी पाए जाने वाले लोगों को माफ नहीं किया जाएगा। वित्तमंत्री की मानें तो नोटबंदी का मूल मकसद डायरेक्ट टैक्स का बेस बढ़ाना, कालेधन के धन-कुबेरों के खिलाफ कार्रवाई, सिस्टम से जाली नोट को अलग किया जाना और कैशलेस सिस्टम को बढ़ावा देना था। जिसमें सरकार को बड़ी कामयाबी मिली है इस बात को लेकर संदेह नहीं किया जाना चाहिए। नगदी लेन देन में 17 फीसदी की कमी आई है, नए करदाताओं की संख्या भी बढ़ी है, 99 फीसदी नोट के बैंक में जमा होने और नए नोटों के बाजार में आने से जाली नोट और हवाला कारोबार में भी कमी आना तय है। लेकिन ये सारी बातें एक आम आदमी के समझ से परे है। उसे तो यह लगा था कि नोटबंदी के देश का भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। लाखों करोड़ों रुपये कालेधन के रूप में सरकार के पास आएंगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ आम आदमी आंकड़ों की इस बाजीगरी को नहीं समझ पा रहा है। हो सकता है कि वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली जी जो दावे कर रहें हो वह सत प्रतिशत सच हो लेकिन इसे समझने के लिए जो दिमाग चाहिए वो आम आदमी कहां से लाए। ऐसे में विपक्ष के दावों की तरफ देश के मध्यम और निम्न वर्ग का झुकाव कोई रोक नहीं सकता है। अगर इन दोनों वर्गों को एक साथ जोड़ दिया जाए तो देश की एक बड़ी आबादी इस समय इस बात को लेकर दुविधा में है कि नोटबंदी का फैसला देश हित में था या फिर पूरे देश में बीजेपी के विस्तार के लिए उठाया गया एक राजनीतिक कदम। कही यह बीजेपी के कांग्रेस मुक्त भारत वाले एजेंडे का हिस्सा तो नहीं था।   




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