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दलित आज भी दलित हैं !

himanshu tiwari

हिमांशु तिवारी

hktiwari009@gmail.com

ऐसा माना जाता है कि दलित शब्द की उत्पत्ति आम बोल-चाल में इस्तेमाल होने वाले शब्द दरिद्र हुआ है. जिसका मतलब होता है गरीब और वंचित, जिसके पास न तो खाने के लिए रोटी होता है और न ही उसके रहने का कोई ठिकाना. इसका किसी जाति विशेष से कोई संबंध नहीं है लेकिन लंबे समय से एक वर्ग विशेष के लिए इस्तेमाल होने की वजह से दलित जाति सूचक शब्द बनकर रह गया. बात देश की आज़ादी से पहले की हो या फिर उसके बाद की, समाज में दलितों के उत्थान के लिए समय समय पर आंदोलन होते रहें है, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद दलित आज भी दलित ही है. चंद मुट्ठी भर लोगों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश की स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है. दलित के नाम पर समाज के एक उपेक्षित वर्ग की तस्वीर उभरकर आखों के सामने आती है जो तमाम तरह के मौलिक अधिकारों से आज भी वंचित है.

हालांकि संविधान की नज़र में देश का हर नागरिक एक समान है. सभी को एक समान अधिकार दिए गए हैं. अनुच्छेद 15 के मुताबिक किसी भी नागरिक के विरूद्ध धर्म, जाति, लिंग और जन्म स्थान और मूलवंश के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है, लेकिन हकीकत ठीक इसके अलग है. दलित देश की आज़ादी के सत्तर साल बाद भी हाशिए पर हैं समरसता के मोर्चे पर समाज में बिखराव स्पष्ट दिखाई देती है. दावा किया जाता है कि दलित शब्द पहली बार 1831 में प्रकाश में आया. इसके बाद डॉ. अंबेडकर ने इसका इस्तेमाल अपने भाषणों में किया, लेकिन अंबेडकर को करीब से जानने वाले मानते हैं कि दलित शब्द का इस्तेमाल कम और डिप्रेस्ड क्लास का इस्तेमाल ज्यादा करते थे.

उत्तर भारत में दलित शब्द को प्रचलित करने का श्रेय बहुजन समाजवादी पार्टी के संस्थापक  कांशीराम को जाता है. जिन्होंने डीएस4 का गठन किया था. डीएस4 का मतलब दलित शोषित समाज संघर्ष समिति से है. काशीराम का नारा था ठाकुर, ब्राह्मण बनिया छोड़ बाकी सब डीएस4. लेकिन इससे पहले 1972 में महाराष्ट्र में दलित शब्द को समाजिक स्तर पर दलित पैंथर्स नामक संस्था ने मान्यता दिलाने में कामयाब रही थी. देश के अलग अलग राज्यों में दलितों को अलग अलग नाम से जाना जाता हैं. महात्मा गांधी समाज के इस वंचित वर्ग को हरिजन कहते थे. हरिजन यानी की भगवान के लोग.

भारत में दलित आंदोलन की शुरुआत ज्योतिराव गोविंदराव फुले ने नेतृत्व में हुई लेकिन दलितों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का काम बाबा साहब भीवराव अंबेडकर ने किया. 1928 में साईमन कमीशन ने स्वीकार किया कि डिप्रेस्ड क्लासेज को प्रातिनिधित्व दिया जाना चाहिए. अन्य अल्पसंख्यकों के साथ दलितों के भी संविधान के निर्माण में मतदान का अधिकार मिला. साथ ही ब्रिटिश सरकार के कमिनुअल अवार्डके तहत दलितों को पृथक निर्वाचन का स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकार भी मिला. जिसका गाँधी जी ने यह कहते हुए विरोध किया की इससे दलित मुख्य समाज से कट जाएगा, इससे हिन्दू समाज और धर्म दोनों को नुकसान होगा.

20 सितम्बर, 1932 से गांधी जी ने कमिनुअल अवार्ड के विरोध में आमरण अनशन की घोषणा कर दी. एक तरफ गाँधी जी और दूसरी तरफ डॉ. आंबेडकर थे. फिर पूना पैक्ट के रूप में बीच का रास्ता निकाला गया. देश की आजादी के बाद भी आरक्षण की व्यवस्था को जारी रखा गया ताकि दलितों का सर्वांगिक विकास हो सके, दलितों का राजनीति, सामाजिक और आर्थिक विकास तो नहीं हुआ लेकिन दलित राजनीतिक दलों के लिए सत्ता हासिल करने का माध्यम बन गए. 2008 में नेशनल एससी कमीशन ने सभी राज्यों को निर्देश देकर दलित शब्द के अधिकारिक दस्तावेज में इस्तेमाल से करने से मना किया जिसका मकसद सामाजिक स्तर पर व्याप्त भेदभाव को मिटना था लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए इस शब्द का इस्तेमाल हर रोज धड़ल्ले से होता है.

इस दौरान सभी राजनीतिक दलों ने एकमत से आरक्षण को जारी रखा ताकि दलितों का राजनीतिक लाभ उठाया जा सके. इस आरक्षण से दलितों का कितना भला हुआ इस बात का अंदाजा दलितों की मौजूदा स्थिति से लागाया जा सकता है लेकिन इतना तो सच है कि इस आरक्षण ने दलितों को एक बार फिर सामाजिक समानता के अधिकार से वंचित कर दिया. क्योंकि समाज के एक वर्ग मानता है कि मौजूदा समय में उनके अधिकार को सिर्फ इसलिए छीना जा रहा है क्योंकि वह तथाकथित सवर्ण वर्ग से आते है. दलित और वंचित वर्ग के नाम पर सात दशक से राजनीति हो रही है. दलित वोटबैंक के दम पर कुछ लोगों ने इस दौरान जमकर चांदी काटी, आरोप-प्रत्यारोप का खेल भी खेला गया. खुद को दलितों का मसीहा कहलाने की होड़ में कोई पीछे नहीं रहा. इस खेल में दलित नेता भी किसी से कम नहीं रहे. इस दौरान दलितों के मसीहा धीरे-धीरे अमीर होते गए और बहुजन समाज हाशिए पर.

 




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