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किसान और कर्ज

किसानों की बदहाली और उनकी कर्जमाफी अब लगातार छाया रहने वाला मुद्दा बन चुका है। किसानों की कर्जमाफी भी हो रही है, लेकिन इसके बाद भी उनकी बदहाली का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। बल्कि किसान कम हो रहे हैं, लेकिन उनके कष्ट नहीं। पिछले कुछ सालों में हालात और बदतर हुए हैं। इसीलिए कर्जमाफी को लेकर उनके धरना-प्रदर्शनों का क्रम भी जारी रहता है। बीते करीब एक महीने से जंतर-मंतर पर भी अपनी मांगों को लेकर तमिलनाडु के किसान बैठे हुए हैं, लेकिन सोमवार उनके सब्र का बांध टूट गया और वे अपनी मांगों को लेकर सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर कूच कर गए। बताते हैं कि वहां कुछ किसानों ने कपड़े तक उतारकर अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन किया। जहां तक कपड़े उतारकर प्रदर्शन करने की बात है तो यह नौबत दो वजहों से आई।

कर्जमाफी का मुद्दा यदि देशव्यापी स्तर पर जोर पकड़ने लगा और हर तरफ से किसान दिल्ली की ओर बढ़ने लगे तो उन्हें संभालना मुश्किल हो जाएगा।

पहली यह कि उन्हें धरने पर बैठे करीब महीनाभर हो गया था और दूसरा कारण यह रहा कि हाल ही में उत्तर प्रदेश की नवगठित योगी सरकार ने राज्य के किसानों का एक लाख रुपए तक का कर्ज माफ करने की घोषणा की है। कपड़े उतारने का संभवत: यही तात्कालिक या कहें कि उकसावे भरा कारण हो सकता है। गौरतलब है कि तमिलनाडु के किसान केंद्र से कर्ज माफी, 40 हजार करोड़ के सूखा राहत पैकेज और कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग कर रहे हैं। किसानों को समर्थन देने के लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और डीएमके नेता स्टालिन भी धरना स्थल पर गए थे। राज्यसभा में भी तमिलनाडु के किसानों की कर्ज माफी पर बड़ा हंगामा हुआ था। सांसदों ने पूरे देश में किसानों का कर्ज माफ करने की मांग की थी। जाहिर है यह सब होना ही था। कर्जमाफी को लेकर अब अन्य राज्यों की ओर से भी इस तरह की आवाजें मुखर होने की संभावना है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट तक कह चुका है कि किसानों की समस्याओं का हल कर्जमाफी नहीं है। हमारा भी स्पष्ट मत यही है कि समस्याओं का हल कर्ज की नौबत खत्म करने में ही है। अगर कर्जमाफी का मुद्दा देशव्यापी स्तर पर जोर पकड़ने लगा और हर तरफ से किसान दिल्ली की ओर बढ़ने लगे तो केंद्र को उन्हें संभालना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन हो जाएगा। बेशक, किसानों के कर्ज की समस्या जटिल है, लेकिन हल के जतन तो ईमानदारी से करने ही होंगे।




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