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पितरों के प्रति श्रद्धा का महापर्व है पितृपक्ष

हिमांशु तिवारी

hktiwari009@gmail.com

सनातन धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के लिए पितृपक्ष का महत्व विशेष होता है। ऐसी मान्यता है कि मोक्ष की कामना में हर साल पितृ पक्ष के दैरान पितर अपने वंशजों के द्वार पर अवतरित होते है। भाद्रपद महीने की पूर्णिमा से लेकर आश्विन माह की अमावस्या तक कभी 14 तो कभी 15 या फिर 16 दिनों तक चलने वाला यह महापर्व कई मायनों में अहम है। दिनों की संख्या में बदलाव के पीछे हिन्दी मास के तिथि में होने वाला बदलाव है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक पितरों की आत्मा की शांति के साथ ही पुत्र का पुत्रत्व भी तभी सार्थक होता है, जब वो अपने जीवित माता-पिता की सेवा करें और उनके मरणोपरांत पितृपक्ष में उनका विधिवत श्राद्ध करें। एक पक्ष तक तक चलने वाले इस महापर्व में लोग अपने अपने पितरों के मौत की तिथि के हिसाब से उनका श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करते है।

लेकिन इसे लेकर कुछ अपवाद भी है जैसे कि सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध उनके पति द्वारा नवमी तिथि को सुहागिन स्त्रियों को भोजन और उपहार देकर किया जाता है। बालकों और साधुओं का श्राद्ध द्वादशी तिथि को किया जाता है। शस्त्रों या हिंसा में मारे गए लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी को करने का विधान है। वहीं जिन पतरों की मृत्यु की तिथि की जानकारी नहीं होती है उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। आमवस्या को किया गया श्राद्ध उतना ही फलदायी होता है जितना पवित्र तीर्थ “गयाजी” में करने से होता है।

वेदों की माने मनुष्य के उपर जन्म से ही तीन प्रकार के ऋण होते हैं। पहला देव ऋण, दूसरा ऋषि ऋण और तीसरा पितृ ऋण। पितृ पक्ष में श्राद्ध प्रक्रिया में शामिल होकर वयक्ति सभी ऋणों से मुक्त हो जाता है। पितृ की श्रेणी में मृत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और सहित सभी पूर्वज आते है। मृत गुरू और आचार्य भी पितृ की श्रेणी में रखा गया है। तैतरीय संहिता के मुताबिक पित्तरों को दक्षिण दिशा मिली हुई है। पितृपक्ष में पितरों का आगमन दक्षिण दिशा से होता है। इसलिए श्राद्ध करने वाला वयक्ति सबसे पहले स्नान करके पवित्र धोती पहनता है… और दर्भा यानी की कुश की अंगूठी अनामिका अंगुली में धारण कर दक्षिण दिशा की तरफ मुंह कर पितरों का आवाहन करता है।

श्राद्ध कर्म के मूल रूप से तीन हिस्से होते है। पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज। चावल, गाय का दूध, घी, शक्कर एवं शहद को मिलाकर बने पिंडों को श्रद्धा भाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करना ही पिंडदान कहलाता है। इस दौरान तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का नाम लेकर पूजन किया जाता है। जल में काला तिल, जौ, कुशा और सफेद फूल डालकर तर्पण किया जाता है। ऐसा करने से पितरों की आत्मा तृप्त होती हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद देते है। इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन और दान देने का विधान है। श्राद्ध के समय कौवों और पक्षियों के लिए भी भोजन रखा जाता है। कौवा भोजन ग्रहण कर ले तो मान लिया जाता है कि पितरों ने भोजन कर लिया। शास्त्रों में कौवे को पूर्वजों के प्रतीक के रूप में मान्यता है और पक्षियों को उनका दूत। श्राद्ध में गौ माता और कुत्ते को भी भोजन कराया जाता है और अंत में घर के बाकी सदस्य भोजन करते है। धर्म शास्त्रों में कुत्ता और कौवा यम का करीबी बताया गया है और गाय वैतरणी पार कराने वाली।

श्राद्ध के लिए हरिद्वार, गंगासागर, जगन्नाथपुरी, कुरुक्षेत्र, चित्रकूट, पुष्कर, बद्रीनाथ सहित 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है। इनमें गया का स्थान सर्वोपरि है। कभी गया में विभिन्न नामों की 360 वेदियां थीं लेकिन अब मात्र 48 ही बची है। इन वेदियों में विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी के किनारे और अक्षयवट पर पिंडदान करना सर्वोत्तम माना जाता है। अक्षयवट के निकट पूर्वजों को दिए गए पिंडदान का फल कभी समाप्त नहीं होता है। पूरे विश्व में गया ही एक ऐसा स्थान है, जहां सात गोत्रों में 121 पीढ़ियों का पिंडदान और तर्पण का विधान है। इस स्थान को मोक्ष की धरती भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि गया में स्वयं विष्णु पितृ देवता के रूप में मौजूद हैं। इस बात का जिक्र रामायण में भी मिलता है। विष्णुपद मंदिर का निर्माण भगवान विष्णु के पदचिन्हों पर किया गया है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु के पांव का निशान आज भी मौजूद है।

धर्मसिन्धु सहित मनुस्मृति और गरुड़ पुराण में महिलाओं को पिण्डदान का अधिकार दिया गया है। परिवार के पुरुष सदस्य के अभाव में कोई भी महिला सदस्य व्रत लेकर पितरों का श्राद्ध तर्पण और तिलांजली देकर मोक्ष की कामना कर सकती है। वाल्मिकी रामायण में सीता द्वारा राजा दशरथ को पिंडदान करने का संदर्भ मिलता है। उन्होंने फल्गू नदी के साथ वटवृक्ष केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर राजा दशरथ को पिंडदान किया था।

महाभारत के एक प्रसंग में इस बात का जिक्र आया है कि दानवीर कर्ण को मृत्यु के उपरांत मोक्ष नहीं मिला तो उन्होंने बड़ा अश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा कि सारी संपत्ती दान करने के बावजूद ऐसा क्यों ? तो चित्रगुप्त महाराज ने कहा हे राजन, आपने देव ऋण और ऋषि ऋण तो चुका दिया है, लेकिन आपके उपर अभी भी पितृऋण बाकी है। इसके बाद दानवीर कर्ण 16 दिन के लिए पुनः धरती पर आए और अपने पितरों का श्राद्धतर्पण तथा पिंडदान विधिवत और उन्हे मोक्ष की प्राप्ति हुई। वास्तव में पितर श्रद्धा के भूखे होते हैं न कि दान दी गई वस्तुओं के।

 




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