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सम्मान की लड़ाई…

लेखक: सीमा कश्यप

kashyapseema99@gmail.com

भारतीय राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच आर-पार की लड़ाई अब उनके नेताओं के सम्मान तक पहुंच गई है। पहले राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए द्वारा विचारधारा को लेकर लड़ाई लड़ी गई जिसमें जमकर क्रॉस वोटिंग हुई और एनडीए की जीत का डंका बजा। उसके बाद उपराष्ट्रपति चुनाव की बारी आई जिसमें दोनों पार्टी गठजोड़ द्वारा गांधीजी के पोते बनाम किसान का बेटा रणक्षेत्र में उतारे गए इस बार भी एनडीए ने अपने जीत का परचम लहराया लेकिन अब जो राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव लड़ा जा रहा है वो अब महज सीट की नहीं बल्कि उनके सम्मान की लड़ाई बन गई है यानि भाजपा और कांग्रेस के जो नेता मैदान में उतरे हैं वो दोनों ही राजनीति के क्षेत्र में मंझे हुए और दिग्गज खिलाड़ी माने जाते हैं। एक तरफ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह हैं जिनके नेतृत्व में आज भाजपा कांग्रेस को ज्यादातर राज्यों से आउट कर चुकी है, तो वहीं सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल इन दोनों की राजनीतिक कौशल दांव पर है।

8 अगस्त को गुजरात की राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं ऐसे में कांग्रेस अपने 44 विधायकों को किसी की नजर न लगे सबको सुरक्षित स्थान बेंगलुरू भेज दिया था जिसके बाद उन्हे अब अहमदाबाद लाया गया। ऐसा इसलिए क्योंकि अटकलें आ रही थीं कि भाजपा कांग्रेस विधायकों को धमकी देने और खरीदफरोख्त करने की भरसक कोशिश कर रही है। खैर कांग्रेस अपने विधायकों के छितरन को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है।

इन दिग्गजों के राजनीति में मान प्रतिष्ठा वाली बात इसलिए सामने आती है क्योंकि गुजरात राज्यसभा के 3 सीटों पर चुनाव हो रहा है। इस दौड़ में भाजपा की तरफ से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और टेक्सटाइल मंत्री व सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी हैं जबकि कांग्रेस की ओर से सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल मैदान में हैं। हालांकि इस चुनाव में शाह और ईरानी की जीत तय मानी जा रही है लेकिन भाजपा के एक और उम्मीदवार बलवंत सिंह राजपूत के अखाड़े में आने से, जो कांग्रेस के पूर्व नेता शंकर सिंह वघेला के रिश्तेदार हैं, के इस सियासी राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है।

ये बड़ा हलचल इसलिए है क्योंकि भाजपा के पास 121, कांग्रेस के 51, एनसीपी के 2, जेडीयू के पास 1 और 1 निर्दलीय विधायक हैं जबकि जीत के लिए किसी उम्मीदवार को 45 मतों की दरकार होगी लेकिन यहां संभावना ये भी जताई जा रही है वाघेला और उनके उम्मीदवार नोटा का भी इस्तेमाल कर सकते हैं अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस की नैय्या भंवर में फंस सकती है। अब भाजपा बलवंत सिंह को मात्र बचे हुए अपने 33 वोटों के दम पर रिस्क ले रही है और भाजपा का यही प्रयास कांग्रेस के गले की हड्डी बन गई है यानि बात शाह और पटेल की राजनीतिक कौशल पर टिक गई है।




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