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मेजर गोगोई सवालों के घेरे में

himanshu tiwari

हिमांशु तिवारी

hktiwari009@gmail.com

जीप के बोनट पर मानव कवच के रूप में एक पत्थरबाज़ को बांधकर कई सैनिकों की जान बचाने वाले मेजर गोगोई के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश जा रही है. मेजर गोगोई पर मानवाधिकार और जेनेवा कनवेंशन के तहत तय किए गए मानकों के उल्लंघन का आरोप है. गोगोई के खिलाफ जम्मू-कश्मीर पुलिस और भारतीय सेना अपने अपने स्तर पर जांच कर रही है. विरोध करने वाले सीधे तौर पर सेना पर सवाल उठाने से बचते नजर आ रहे है शायद यही वजह है कि मानवाधिकार के बहाने मेजर गोगोई पर और जेनेवा कन्वेंशन के बहाने भारतीय सेना की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं. हालांकि सेना और केंद्र सरकार ने मेजर की सूझबूझ की सराहना की है. सेना की तरफ से मेजर को सम्मान देने की घोषणा किया जा चुका है. वहीं एटर्नी जनरल ने साफ किया है कि मेजर ने जो किया वो बिलकुल सही है, और केंद्र सरकार उनके साथ है.

विरोध करने वालों का तर्क है कि मेजर के खिलाफ स्थानीय पुलिस की जांच अभी पूरी नहीं हुई है और सेना की तरफ से गठीत कोर्ट और इंक्वायरी का अंतिम रिपोर्ट नहीं आया है. ऐसे में मेजर को सम्मानित किए जाना सही नहीं है. मेजर गोगोई के पीसी को लेकर भी सवाल खड़े किए जा रहें है. यह पहला मौका है जब मेजर रैंक के किसी अधिकारी को किसी मुद्दे पर मीडिया में आकर अपनी बात रखने की सेना और रक्षा मंत्रालय ने इजाजत दी. इसकी वजह आम आदमी के मन में उमड़ रहे उन सवालों का जवाब देना था कि उस दिन आखिर हुआ क्या था. इस काम के लिए मेजर से बेहतर कोई दूसरा हो ही नहीं सकता था. मेजर ने जिस ईमानदारी से अपनी बात रखी उसके बाद मामला शांत हो जाना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ. सवाल उठाए गए कि जिस अधिकारी पर जांच बैठाई गई है वो मीडिया में आकर सफाई कैसे दे सकता है. यहां इस बात की किसी को चिंता नहीं है कि जिस मानव कवच के नाम पर मेजर को बलि का बकरा बनाने की कोशिश की जा रही है अगर उसने ऐसा नहीं किया होता तो क्या होता. इसमें कोई शक नहीं है कि पत्थरबाजों के बीच फंसे जवान अपनी जान बचाने के लिए बंदूकें उठाते और कई पत्थरबाज़ मारे जाते. फिर यहीं लोग चीख चीख कर कहते की भारतीय सेना ने मासूम पत्थरबाज़ों को गोली मार दी. भारतीय सेना अत्याचारी है, सेना को दूसरे विकल्पों पर विचार करना चाहिए था. कुछ दिन पहले पैलेट गन को लेकर भी काफी हो- हल्ला मचा था.

घाटी में पत्थरबाजों के हमदर्द सिर्फ अलगाववादी नेता ही नहीं है, इस खेल में नेशनल कॉन्फ्रेस भी पूरी तरह से शामिल है. नेशनल कॉफ्रेंस ने मेजर गोगोई के खिलाफ कोर्ट केस दर्ज कराकर खुद को इन पत्थरबाजों का हमदर्द साबित करने का एक और प्रयास किया है. मेजर गोगोई पर सवाल उठाने वालों का कहना है कि जिस शख्स को जीप को बोनट पर बांधा गया था वो आम शहरी है, वो कश्मीर को वोटर है, वहीं सेना उसे पत्थरबाज़ बता रही है. वैसे पत्थरबाजों को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेस के नेताओं की हमदर्दी सभी जानते हैं. हाल ही में हुए लोकसभा उप-चुनाव के दौरान फारूख अब्दुल्ला चीख-चीख कर पत्थरबाजों को मासूम साबित करने की कोशिश कर रहें थे. उमर अबदुल्ला के ट्वीट ने इस मामले को तूल दिया और सेना को बदनाम करने को कोशिश की गई.

आए दिन घाटी में पत्थरबाजी की तस्वीरें मीडिया में आते रहती है. सेना और दूसरे अर्धसैन्य बलों के जवानों पर होने वाली पत्थरबाजी की घटनाए आम बात होती जा रही है. जिस काम को बंदूक के दम पर अलगाववादी पूरा नहीं कर सके उसके लिए अब स्कूल के बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है. जिनके खुद के बच्चे कभी कश्मीर नहीं आते वो दूसरों के बच्चों के हाथों में पत्थर थमा कर कश्मीर की आजादी के नारे लगवाते हैं. सेना के जवानों पर पत्थर फेंकने के एवज में उन्हे चंद रुपये देते हैं. इस पत्थरबाजी के कश्मीरी अवाम का कभी भला नहीं हो सकता. हां इतना तो सच है कि इन बच्चों का भविष्य अलगाववादी ताकतों के यहां गिरवी रह जाएगी. जो पूरी जिंदगी इनके इशारों पर नाचते रहेंगे. सेना और सरकार के सामने आम कश्मीरी को बचाने की चुनौती है और हमें कश्मीरी और पत्थरबाजों के बीच के फर्क़ समझने की आवश्यक्ता है.

देश के सामने आज एक बहादुर सैनिक को अपराधी के तौर पर पेश करने की नाकाम कोशिश की जा रही है. जिसका खुलकर विरोध होना चाहिए. मेजर गोगोई ने किसी का कत्ल नहीं किया है, उसने किसी का अपहरण नहीं किया है, उसने न सिर्फ अपने साथी जवानों की जान बचाई है बल्कि उन पत्थरबाजों की भी जान बचाई है, जो उन सैनिकों को मारने के लिए अपने हाथों में पत्थर लेकर वहां मौजूद थे. ऐसे सैनिक का सम्मान होना चाहिए. अलगावावदी ताकतों का विरोध तो समझ आता है लेकिन विपक्षी दलों का इस तरह का विरोध उनके राजनीतिक कद को कम कर देता है. दिल्ली से लेकर कश्मीर तक विपक्ष को साकारात्मक भूमिका में आना होगा. तभी जाकर कश्मीर में शांति कायम हो पाएगी.

 




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