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ईवीएम का विरोघ तो महज एक बहाना है

himanshu tiwari

हिमांशु तिवारी

hktiwari009@gmail.com

ईवीएम का विरोध महज एक राजनीतिक बहाने बाजी के अलावा कुछ ज्यादा नहीं निकला. कल तक ईवीएम का विरोध करने वाले और नब्बे सेकेंड में ईवीएम हैक करने का दावा करने वाले अब भागते नज़र आ रहें है. हैकिंग से भागने वालों का कहना है कि आयोग उसे ईवीएम का मदरबोर्ड बदलने की इजाजत नहीं दे रहा है इसलिए वो इसमें शामिल नहीं हो सकते हैं वहीं आयोग का कहना है कि अगर ईवीएम का मदरबोर्ड ही बदल दिया जाए तो उसमें कुछ और बचता ही नहीं है, ईवीएम नया हो जाता है. जब तक आयोग हैकाथन के लिए तैयार नहीं था तब तक हैक करने के सौ दावे किए जा रहे थे लेकिन जैसे ही आयोग ने चुनौती स्वीकार किया, एक नया पैंतरा खेल दिया गया. आप और कांग्रेस का कहना है कि चुनाव आयोग को ईवीएम में बिना रोक-टोक हैकाथन करने देना चाहिए. वहीं एनसीपी को छोड़कर किसी और पार्टी ने हैकाथन में हिस्सा लेने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है. माकपा, भाकपा, रालोद और भाजपा ने सिर्फ चैलेंज को देखने में रुचि दिखाई है.

दरअसल, लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को केंद्र में बहुमत की सरकार बनाने का पहला मौका मिला. नरेंद्र मोदी बीजेपी के लिए गुड़ लक साबित हुए. जो लोग 2014 के लोगसभा चुनाव से पहले मोदी का विरोध कर रहें थे उन्होंने भी धीरे धीरे इस सत्य को स्वीकार कर लिया की मोदी ही बीजेपी का भविष्य है. अटल आडवाणी युग का अंत हो चुका है इस बात में कोई शक नहीं है. नरेंद्र मोदी ने केंद्र की राजनीति में आने के बाद बीजेपी का कद काफी तेजी से बढ़ा. एक के बाद एक कई राज्यों में बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब रही. कांग्रेस मुक्त भारत का जुमला सही साबित होने लगा. इस बीच राजधानी दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटों पर कब्जा कर बीजेपी को बड़ा झटका दिया. आप की जीत ने पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की चुनावी रणनीति के लिए बड़ी चुनौती बन गई. हालांकि दिल्ली में केजरीवाल की जीत और बीजेपी की हार की वजह अन्ना के आंदोलन से उपजे केजरीवाल पर आम आदमी का भरोसा और बीजेपी में सीएम पद को लेकर मचा घमासान था. लेकिन सीएम केजरीवाल और आप आदमी पार्टी इस जीत को संभाल नहीं पाए. जिस विश्वास से दिल्ली के लोगों ने आप को सत्ता सौंपी थी उस पर पार्टी खरी नहीं उतरी. धीरे धीरे जनता को मोह भंग होने लगा. इसका नतीजा गोवा और पंजाब में पार्टी के सामने हार के रुप में आई. इस हार को छुपाने के लिए ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगाया गया. दावा किया गया की बीजेपी की जीत के पीछे जनता का समर्थ नहीं बल्कि ईवीएम है. बीजेपी का जीत फर्जी है, ईवीएम में छेड़छाड़ कर बीजेपी सत्ता पर कब्जा करने का अनैतिक खेल खेल रही है और चुनाव आयोग खामोश बैठकर तमाशा देख रहा है. चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठे. क्योंकि देश में निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी युनाव आयोग की है. आम आदमी पार्टी के इस खेल में कांग्रेस, बहुजन समाजवादी पार्टी, समाजावादी पार्टी और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने राजनीतिक लाभ के लिए ईवीएम के मुद्दे को मीडिया में उछाला. आम आदमी पार्टी ने तो दिल्ली विधानसभा में ईवीएम हैक कर साबित कर दिया की बीजेपी की जीत के पीछे ईवीएम का ही रोल है और चुनाव आयोग इस पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है. ईवीएम पर एकजुटता दिखाते हुए विपक्ष ने चुनाव आयोग से मिलकर ईवीएम हैक करने की चुनौती दे डाली. आयोग के सामने खुद को राजनीतिक साजिश से बचाने और जनता के मन में निष्पक्ष चुनाव के प्रति विश्वास बनाए रखने की चुनौती थी. आयोग ने राजनीतिक दलों की चुनौती को स्वीकार करते हुए हैकाथन के लिए 3 जून का कार्यक्रम तय किया और चैलेंज में शामिल होने के लिए इच्छुक राजनीतिक दलों से आवेदन मांगा.

लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव करना चुनाव आयोग का काम है. इसके साथ ही अगर किसी पार्टी को चुनाव संबंधी कोई शिकायत है तो उसका निवारण भी आयोग को ही करना होता है लेकिन अगर शिकायत सिर्फ राजनीतिक लाभ के उद्देश्य किया जाए तो इसे लोकतंत्र के खिलाफ षड़यंत्र नहीं तो और क्या कहा जा सकता है. जिस ईवीएम के दम पर आप दिल्ली में और कांग्रेस पंजाब में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में कामयाब रही उसी ईवीएम के खिलाफ चुनौती देना मजाक नहीं तो और क्या है. अगर वास्तव में ईवीएम हैक किया गया था तो बीजेपी दिल्ली कैसे हार गई, बिहार में पार्टी को हार का सामना क्यों करना पड़ा, गोवा में बीजेपी को कांग्रेस के कम सीटें क्यों मिली, पंजाब बीजेपी-अकाली दल के हाथों से क्यों निकल गया. इन तमाम सावलों पर गौर करने की आवश्यक्ता है. लोकतंत्र में जनादेश का सम्मान किया जाना चाहिए.




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