कुंभ भारतीय संस्कृति का जीवन्त दर्शन है

कुंभ भारतीय संस्कृति का जीवन्त दर्शन है। इस महापर्व पर विश्व भर के हिन्दुओं का सुंदर संगम होता है। जांति-पांति, धर्म, भेदभाव, छुआछूत और पंथों की विविधता को अनदेखा कर, भारत की समन्वित संस्कृति एक साथ स्नान करती हुई दिखती है। महापर्व कुंभ के अवसर पर अनूठे आयोजनों का साकार रूप देखने को मिलता है। चारों तरफ रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषदों के वृत्तांत सुनायी देते हैं।

भारतीय संस्कृति अपनी बहुविध नाना सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जानी जाती है। एक कहावत है जो भारत के लिए प्रसिद्ध है कि यहां नित रोज त्यौहार होते हैं। प्रत्येक माह कोई न कोई बड़ा महापर्व होता है। सही भी है। विक्रमादित्य द्वारा बनाए गए सम्वत, उस पर आधारित पंचांग तथा उनमें वर्णित तिथियां, त्यौहारों व परंपराओं तथा महापर्वों को शक्ल देती हैं। राजा बलि से पराजित हो जाने के बाद देवताओं का अस्तित्व लड़खड़ाने लगा था। तब ब्रह्माजी के साथ सभी देवता मिलकर बैकुण्ठ में भगवान विष्णु के पास गये और सारा वृत्तांत उन्हें सुनाया। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को उचित परामर्श देते हुए यह कहा, जब कभी बलवान शत्रु हो तो उससे मित्रता कर लेनी चाहिए। तुम्हें भी राजा बलि से मित्रता करके भविष्य का हित साधन करना होगा।

देवताओं ने भगवान विष्णु से हित साधन का अर्थ जानना चाहा, ऐसे में भगवान विष्णु ने देवताओं को यह कहा कि राजा बलि से संधि करके समुद्र मंथन के लिए उसे राजी करें। समुद्र मंथन करने पर उसमें से नाना द्रव्य वस्तुओं सहित अमृत भी प्राप्त होगा जिसे देवता लोग अगर पी लेंगे तो अमर हो जायेंगे। इस प्रकार से पराजय का कभी मुंह नहीं देखना पड़ेगा।

समुद्र मंथन
देवताओं ने राजा बलि से मेल करके समुद्र मंथन की योजना बनायी। इसमें मंदरांचल पर्वत, वासुकी नाग भगवान, कश्यप भगवान, विष्णु, शिव आदि की सहायता लेकर समुद्र मंथन आरंभ किया गया। समुद्र मंथन के दौरान विष निकला जिसे देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शंकर ने अपने गले में निगल लिया। इस प्रकार से उस खतरनाक विष से देवताओं की रक्षा करने के कारण भगवान शंकर नीलकंठ कहलाये।

मंथन के अगले दौर में कामधेनु गाय, उसके बाद उच्चश्रवा घोड़ा निकला जिसे राजा बलि ने मांग लिया। उसके बाद ऐरावत हाथी निकला जिसको देवराज इन्द्र को दे दिया गया। मंथन की इसी प्रक्रिया में अगली वस्तु कौस्तुभ मणि प्राप्त हुई जिसे देवताओं ने भगवान विष्णु को समर्पित कर दिया। इसी प्रकार से पारिजात वृक्ष निकला जिस देवताओं ने स्वयं ले लिया। फिर रम्भा नामक नर्तकी निकली जो स्वर्ग की नर्तकी बनी।

मंथन प्रक्रिया के दौरान आठवीं वस्तु लक्ष्मी जी निकली जिनका भगवान विष्णु ने वरण कर लिया। तत्पश्चात वारूणि निकली जिसे दैत्यों ने ले लिया। फिर चन्द्रमा निकला जो आकाश की शोभा बना और इसी प्रक्रिया के दौरान शंख हरिधनु, धन्वन्तरि जी निकले, चौदहवां रत्न अमृत कुंभ निकला। अमृत कुंभ से पहले बंटवारा देवता व दैत्यों के मन माफिक चल रहा था लेकिन अमृत के निकलने के पश्चात उसके आधिपत्य को लेकर देवताओं और दानवों में संघर्ष छिड़ गया।

दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने दैत्यों को यह आदेश दिया कि किसी भी प्रकार से कुंभ का अमृत पान किया जाए। अमृत घट को लेकर जो छीना-झपटी आरंभ हुई, उसको देखकर भगवान विष्णु ने त्वरित रूप से एक सुन्दरी का वेश धारण कर, देवताओं और दानवों से कहा कि वे आपस में झगड़े नहीं। उनको बारी-बारी से सुन्दरी (भगवान विष्णु) अमृत पान करा देंगी। पहले इसके लिए देवताओं को कतारबद्ध बुलाया गया। देवता लोग बारी-बारी से अमृत को चखने लगे। तब एक दैत्य ने सुन्दरी की चालाकी को भांप लिया। वह चुपके से देवताओं की पंक्ति में जा घुसा। सूर्य और चन्द्रमा ने दैत्य को अमृत चखते देख लिया। उन्होंने सुन्दरी रूपी भगवान विष्णु को इसके बारे में बताया। तब सुन्दरी अपने मूल रूप में प्रकट हुई और भगवान विष्णु ने तुरन्त अपने सुदर्शन चक्र से दैत्य का सिर काट दिया लेकिन वह अमृत पी चुका था, इसलिए वह मरा नहीं। उसके सिर का नाम राहू और धड़ का नाम केतु हो गया जो आज भी तथा निरन्तर बुरा ग्रह बना रहेगा।

अब जबकि दैत्यों को देवताओं की असलियत का पता चल गया, तब ऐसे में वे अमृत कुंभ के लिए संघर्ष करने लगे। इस संघर्ष के दौरान अमृत घट को लेकर इन्द्र का पुत्र जयंत भाग गया। देवता भी उनका पीछा करते रहे। यह संघर्ष लम्बे समय तक चला। बृहस्पति, सूर्य, चन्द्रमा आदि ने अन्य देवताओं के साथ जयंत का साथ देते हुए अमृत घट की रक्षा में अहम भूमिका निभायी। इस दौड़ भाग के दौरान कुल बारह स्थानों पर घट से अमृत की बूंदें निकल पड़ी। इनमें से आठ स्थान तो देवलोक के हैं। चार स्थान पृथ्वीलोक के हैं।

जहां अमृत की बूंदें गिरीं, वहां कुंभ
पृथ्वीलोक के जिन चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरी थी, वहां कुंभ का महापर्व मनाया जाता है। देवताओं और दानवों के बीच में बारह दिनों तक अमृत घट को लेकर संघर्ष चला था। देवताओं के बारह दिनों को हिन्दू धर्म में बारह वर्षों के रूप में माना जाता है। कुंभ राशि के बृहस्पति में होने पर हरिद्वार में, वृष राशि के बृहस्पति में होने पर प्रयाग में, सिंह राशि के बृहस्पति में होने पर नासिक में और वृश्चिक राशि के बृहस्पति में होने पर उज्जैन में कुंभ पर्वो का बारह वर्षो के अन्तराल के पश्चात महामेला आयोजित होता है। प्रयाग तथा हरिद्वार में तो छह वर्षों के पश्चात अर्धकुंभी मेलों का भी आयोजन होता है। कुंभ का मेला हर तीन वर्ष के अन्तराल पर किसी न किसी स्थान पर अवश्य होता है।

कुंभ भारतीय संस्कृति का जीवन्त दर्शन है। इस महापर्व पर विश्व भर के हिन्दुओं का सुंदर संगम होता है। जांति-पांति, धर्म, भेदभाव, छुआछूत और पंथों की विविधता को अनदेखा कर, भारत की समन्वित संस्कृति एक साथ स्नान करती हुई दिखती है। कुंभ पर्व में पराधीन भारत में भी स्नानार्थियों की संख्या करोड़ से ऊपर पहुंच जाती थी और आज भी प्रमुख स्नानों के अवसर पर यह संख्या करोड़ का आंकड़ा पार कर ही जाती है। सौ लाख से भी ज्यादा की संख्या को अनुशासित और एक ही संस्कृति के ढांचे में राग अलापते हुए देख विश्वभर की मीडिया कवरेज करती हुई नहीं अघाती।

महापर्व कुंभ के अवसर पर अनूठे आयोजनों का साकार रूप देखने को मिलता है। चारों तरफ रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषदों के वृत्तांत सुनायी देते हैं। गीता का उपदेश, भागवत कथा, सुन्दरकाण्ड, रामचरितमानस की चौपाइयां ये सब विभिन्न रूपों में सुनने और समझने को मिलती है। कुंभ के अवसर पर मिट्टी के कलश में घी, दूध, जल भरकर दान करने तथा तपस्या करने को बड़ा पुण्यदायी माना गया है।




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