BREAKING NEWS -
Search

खुला पिंजरा: मिटठू-मिटठू की रट लगाए रहती मादा तोता

एक थी मादा तोता। चटकीले हरे पखों और लाल चोंच वाली। वह पिंजरे को ही अपना घर समझती। उसे पेड़ की कोटर से पिंजरे में कौन लाया, इसका तो किसी को पता नहीं। सब उसे मिटठू के नाम से पुकारते। उसका पिंजरा दिन भर घर के दरवाजे समीप लटका रहता। उसमें बैठी वह मिटठू-मिटठू की रट लगाए रहती।

सब उसे प्यार करते, दुलारते और खाने के कभी फल, हरी मिर्च तो कभी पूड़ी कचौड़ी मिष्ठान देते। वह मगन होकर खाती और मस्त रहती। उसकी जिंदगी पिंजरे में मज़े से गुज़र रही थी। तभी हुआ यह कि तोते के मालिक को जाने क्या सूझी उसने कि उसने उसका नाम मिटठू से बदल कर अभिव्यक्ति रख दिया।

मालिक खुद को मौलिक लेखक समझता था। उसने अपने इष्ट मित्रों से घन्टों तोता विमर्श के बाद अभिव्यक्ति का पिंजरा खोल दिया। उनका मानना था कि अभिव्यक्ति उन्मुक्त होगी तभी आकाश की ऊंचाइयों को छू पाएगी। उसके मित्रगण अपने इस कारनामे पर इतना मुदित हुए कि उन्होंने इस प्रकरण पर बीस सेकंड में सैकड़ों हाईकू व लघुकथाएं रच डालीं।

वे साहित्य सृजन में डूबे रहे और अभिव्यक्ति सोचती रही कि वह पिंजरे से बाहर जाए तो जाए कहां। पिंजरा खुला रहा और वह सोचती रही। उसने व्यथित होकर पुकारा, मिटठू-मिटठू तो मालिक ने उसे तुरन्त डपट दिया, मिटठू नहीं ,अभिव्यक्ति बोल। अब तेरा यही नाम है। आखिरकार हार-थक कर अभिव्यक्ति अपने पिंजरे से बाहर निकली।

उसने पंख फड़फड़ाए और आकाश में उड़ना चाहा। वह कुछ ही ऊपर उड़ सकी और फिर घर के बाहर लगे पेड़ पर जा बैठी। उसने मिटठू-मिटठू की टेर लगाई कि कोई तो उसकी विपदा समझेगा और उसे पिंजरे में वापस पहुंचा देगा। पेड़ की फुनगी पर बैठी उदास अभिव्यक्ति हमेशा पिंजरे में वापस आने को आतुर रहती। उसे पिंजरे से बाहर खतरे ही खतरे दिखते।

कभी बिल्ली, कभी बाज़ और कभी गली के शैतान बच्चों के हाथ में गुलेल देखती तो सहम जाती। उसे भोजन के लिए पूरी जद्दोजेहद करनी पड़ती है, फिर वैसे मालपुए कहां मिल पाते, जैसे पहले मिलते थे बैठे-ठाले। उसने बाहर जीना तो सीख लिया। एक दिन उसे अपना पुराना मालिक मिला तो उसने कहा, आपने मुझे अभिव्यक्ति बना कर मुसीबत में डाल दिया।

मुझे वापस घर ले चलो। मालिक ने कहा, अब तुझे कौन रखेगा घर में। मैंने सुना है कि तू अब गंदी गंदी गलियां देना सीख गई है। सबका मखौल उड़ाती है, अफवाहें फैलाती है। खरी-खरी कहती है। कभी वाचाल ट्विटर के साथ तो कभी किताबी चेहरे वाले खटरागियों की संगत में दिखती है। मैंने सुना है कि तू तोतों को देख कर सीटी भी बजाती है।

मैं ठहरा बाल बच्चों वाला संस्कारवान लेखक तुझे अपने घर में रख कर मुझे समाज में अपनी थू -थू नहीं करवानी। तू जहां है, वहीं रह। अभिव्यक्ति को पिंजरे से मुक्त हुए अरसा हुआ। उसे सपने में पिंजरा अभी भी दिख जाता है। कभी किसी राजा, सामंत, दलाल, साहूकार या धन्नासेठ का नरमदिल पसीजेगा तब ही इसका स्वप्न साकार होगा। इनको पालतू मिटठूओं की ही दरकार रहती है।




>