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ओम बिड़लाः सामाजिक सरोकार के पुरोधा

मनोज कुमार तिवारी

आगामी पांच साल के लिए जिस व्यक्ति को सदन में संसदीय मर्यादा को बनाए रखने एवं अच्छे वाद-विवाद कराने की जिम्मेदारी दी गयी है वह हैं ओम बिड़ला। उन्हें 17वीं लोकसभा का स्पीकर यानी लोकसभा अध्यक्ष निर्विरोध चुन लिया गया है। 23 नवंबर 1962 को जन्में 56 वर्षीय ओम बिड़ला लगातार दूसरी बार राजस्थान के कोटा-बूंदी संसदीय क्षेत्र से सांसद बने हैं। एक सक्रिय राजनीतिज्ञ के रूप में ओम बिड़ला का सफर काफी पहले ही शुरू हो चुका था। उन्होंने साल 2003, 2008 और 2013 में कोटा दक्षिण विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।

राजनीति की गहरी समझ रखने वाले बिड़ला विधानसभा की कई समितियों से भी जुड़े रहे हैं। एम. कॉम की डिग्री हासिल किए बिड़ला प्रबंधन की अच्छी समझ रखते हैं। यूथ को साथ लेकर चलना उनकी खासियत है। युवाओं में राष्ट्रवादी भावना को जगाने के लिए उन्होंने कोटा में आजादी के स्वर महोत्सव का आयोजन 2006 में शुरू किया जो आज भी आयोजित भी हो रहा है। इसी के चलते उन्हें 6 वर्ष तक भारतीय युवा जनता मोर्चा राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का दायित्व मिल चुका है।

राजनीति के अलावा सामाजिक सरोकारों एवं आंदोलनों से उनका घनिष्ठ जुड़ाव रहा है। निर्धन और जरूरतमंद व्यक्तियों की सहायता के लिए उन्होंने नि:शुल्क परिधान उपहार, प्रसादम, मेडिसिन बैंक जैसे केंद्रों की स्थापना की। इसी क्रम में उन्होंने वंचित वर्ग को शिक्षा से जोड़ने के लिए मेरी पाठशाला नामक पोर्टेबल स्कूल की भी स्थापना की। ठंड हो या बारिश या 2001 में गुजरात में आया भूकंप उनकी सामाजिक सेवा की प्रतिबद्धता का कोई सानी नहीं है।

इसके अलावा ओम बिड़ला कई आंदोलनों में महती भूमिका निभायी है। राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के चलते उन्हें जेल भी जाना पड़ा। कोटा शहर में आईआईटी की स्थापना, पर्यावरण कार्यक्रम और चंबल नदी का पानी उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने व्यापक जनआंदोलन भी किया है। इस तरह अपने हर मिशन और उद्देश्य में सफल रहने वाले ओम बिड़ला की असली परीक्षा लोकसभा में होना बाकी है। जहां उन पर अलग-अलग विचार और नीतियों वाले सांसदों को साथ लेकर देश की चुनौती है।

अगले पांच तक साल देश की खुशहाली और प्रगति के लिए तर्क-वितर्क और संवाद में निष्पक्षता से संतुलन साधने की जिम्मेदारी पर देश की निगाहें रहेंगी। क्योंकि वह सदन की गरिमा और शक्ति के प्रतीक हैं। इसलिए उनसे यह अपेक्षा स्वाभाविक है।




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