आम आदमी के हित चिंतक थे लोकबंधु राजनारायण

गोपाल जी राय, 

(लेखक डीएवीपी के अधिकारी हैं)

भारतीय लोकतांत्रिक राजनीति में लोकबंधु राजनारायण आम आदमी के हित चिंतक थे। इनकी बेहतरी के लिए उन्होंने आजीवन संघर्ष किया। स्वार्थी और सत्ता उन्मुखी सियासी धारा को जिस तरह से उन्होंने परोपकारी राजनीतिक दरिया के रूप में परिणत करने की भगीरथ कोशिश की, उसी के बल पर जम्हूरी इतिहास में उन्होंने अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करवा लिया।

देखा जाए तो इंसानियत और मानवता के वह वैचारिक प्रकाश स्तम्भ हैं जिससे एक लंबे कालखंड तक परस्पर विरोधी स्वभाव वाला सियासी जगत भी आलोकित और अनुप्राणित होता रहा। भले ही आज हमारा राजनैतिक समाज जिन ओछी विद्रूपताओं से ग्रसित है, उससे वो कोसों दूर रहे। जातिवाद, परिवारवाद, सम्पर्कवाद, संशयवाद, लाभवाद और षड्यंत्रवाद से वो विचार और कर्म दोनों में कोसों दूर रहे।

कमोबेश निज जीवन के शुरुआती कालखंड में मिला सद्गुणों का सान्निध्य ही भविष्य का ऐसा पथप्रदर्शक बना कि उन्हीं नैतिक जीवन मूल्यों और सियासी वसूलों का अनुशरण करते हुए समसामयिक राजनैतिक विडम्बनाओं से जूझता रहे, और उन्हें बदलने के निमित्त अपना नैतिक-भौतिक योगदान करते रहे। इसलिये आज जब मित्रवत समाज उन्हें टुकड़ों-टुकड़ों में याद करते करते हुए इस अहम राष्ट्रीय विमर्श तक पहुंचा है तो आप सुधीजनों का आभार प्रकट करते हुए मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि कुछ ऐसा किया जाय कि उनके अधूरे सपने आज नहीं तो कल अवश्य साकार हों, जिससे इंसानियत और मानवता हर पल गौरवान्वित हो सके, न कि उपेक्षित दिखने को अभिशप्त रहे।

यूं तो आधुनिक राजनीति की ‘वैचारिक दरिद्रता’ जगजाहिर है। इससे फली-फूली ‘पक्षधर अमीरी’ भी किसी से छिपी हुई नहीं है। यही वजह है कि गरीबों के मसीहा लोकबंधु राजनारायण जी के ओजस्वी विचार, समदर्शी व्यवहार और  नैतिक जनसरोकार आज भी हमारे बीच प्रासंगिक हैं और आगे भी यथावत बने रहेंगे। सच कहा जाय तो आजादी की लड़ाई में अपने अविस्मरणीय योगदान, भूमिहीन दलितों के बीच लगभग 800 बीघा अपनी पैतृक जमीन के समान बंटवारे और जनता पार्टी की सरकार में बतौर केंद्रीय मंत्री, सत्ता के विकेंद्रीकरण के मद्देनजर किये गए अपने सराहनीय प्रयासों के लिये भी आप जाने जाते थे, हैं और युग युग तक रहेंगे।

कहना न होगा कि आपका निश्छल और बेदाग व्यक्तित्व ना  केवल समकालीन बल्कि परवर्ती ‘वैचारिक दरिद्रनारायणों’,  धनलोलुप नेताओं, पदलोलुप नौकरशाहों, सत्ता सान्निध्य पाने को लालायित अन्य पेशेवरों के लिये भी प्रेरणास्रोत, अनुकरणीय साबित हो सकता था, है भी, लेकिन दुर्भाग्यवश कतिपय स्वार्थपरक निर्लज्ज विचारों और संस्थागत वैधानिक कमजोरियों के चलते ऐसा न तो तब सम्भव हो पाया और न ही अब सम्भव है!

लिहाजा यह यक्ष प्रश्न सबके समक्ष समुपस्थित है कि ऐसा क्यों, किसके लिये और कबतक? यही वजह है कि जब भी हमलोग सर्वांगीण लोक सरोकारों को पूरा करने के लिये अपनी जनप्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं, तो आज भी हमें वक्त की कसौटी पर कसे हुए और खरे उतरे लोकबंधु राजनारायण के राजनैतिक और सामाजिक आचरणों का अनुकरण करने की दरकार महसूस होती है। यह बात अलग है कि पूर्वाग्रह ग्रस्त लोग इससे परे भी सोच सकते हैं और सोच भी रहे हैं, अन्यथा उनकी जनशताब्दी भी सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा धूमधाम से मनाई गई होती!

किसी के लिये भी यह ज्वलन्त सवाल है कि जब ‘धनलक्ष्मी’ ही आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाय या है तो इसके लिये किसे जिम्मेवार ठहराया जाय? आखिरकार किससे यह प्रश्न पूछा जाय कि वह कौन सी वजह है जिसके चलते आजादी के सात दशक बाद भी ‘धनलक्ष्मी’ समान रूप से सबकी दहलीज तक नहीं पहुंच पाई है? वह कौन सा कारण है कि अपेक्षाकृत विनम्र और सहनशील राष्ट्र भारत की वैश्विक कूटनीति लगभग विफल हो चुकी है और वह आज अपने ही पड़ोसियों से संघर्षरत है और उन सबसे दो-दो हाथ करने की कुशल रणनीति बनाने की बजाय भारत सरकार और आमलोग आतंकवाद, नक्सलवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, भाषावाद, लिंगभेद, वर्गसंघर्ष जैसी अनसुलझी गुत्थियों को ही सुलझाने में तल्लीन तो हैं, लेकिन निष्कर्ष नदारत!

कारण स्पष्ट है। दरअसल, हमारी व्यवस्था स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व जैसे उदार जनतांत्रिक आदर्श के व्यवहारिक अमल से कोशों दूर है। लेकिन यदि हमलोग समाजवादी राजनेता लोकबंधु राजनारायण के वैश्विक, राजनैतिक और सामाजिक आदर्शों की वैचारिक पूंजी और सुस्थापित लोक मर्यादा को लेकर आगे बढ़ेंगे तो निःसंदेह उन सभी जटिल परिस्थितियों से निपटना बिल्कुल सहज और सरल हो जायेगा।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि ‘वैचारिक विरोधाभाष’ के कर्ज तले भारतीय राजनीति इतनी डूब चुकी है कि ‘तुच्छ पक्षधरता’ रूपी ब्याज अदायगी करते-करते इसके हाथ-पांव फूल रहे हैं। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि कहीं न कहीं भारतीय संविधान भी इसे प्रोत्साहित कर रहा है। संसद, सचिवालय, सर्वोच्च न्यायालय की सर्वोच्चता के अंतर्द्वंद और स्वतंत्र मीडिया के अविवेकी और पूर्वाग्रही नजरिये के चलते स्थिति दिन-प्रतिदिन जटिल होती जा रही है। लिहाजा राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सबसे बढ़कर प्रशासनिक/न्यायिक मूल्यों में दृष्टिगोचर हो रहे क्षरण और ओझल हो रही ईमानदारी व इंसानियत के मौजूदा परिवेश में भी गरीबों के मसीहा लोकबंधु राजनारायण जी को याद करना प्रासंगिक और समीचीन है ताकि भावी पीढ़ी समय रहते ही उन जैसे जननायकों/लोकनायकों से अच्छी सबक सीख सके।

1970 के दशक में लौह महिला प्रधानमंत्री श्री मती इंदिरा गांधी को उनके ही राजनैतिक गढ़ राजबरेली में शिकस्त देने वाले सुप्रसिद्ध समाजवादी नेता लोकबंधु राजनारायण जी की चर्चा आज इसलिये भी प्रासंगिक है कि उनके सुलझे हुए समाजवादी विचारों से बिखरते हुए ‘समाजवादी मनकों अर्थात राजनीतिक दलों’ को पुनः गूंथकर एक आदर्श राजनीतिक माला तैयार किया जा सके जिसकी मजबूत भागीदारी केंद्रीय सत्ता में हो। ये लोग जातिवाद और साम्प्रदायिकता से दूर रहें और कांग्रेस/भाजपा के पिछलग्गू होने से भी बचें ताकि पूंजीवादी विचारों की छाया उनपर नहीं पड़े और समदर्शी समाजवाद के सपने साकार हो सकें।

यह ठीक है कि राज्यों की राजनीति में समाजवादी दल मजबूती से जमे हुए हैं, लेकिन एनडीए और यूपीए के राजनैतिक आकर्षण के बीच केंद्रीय राजनीति में उनकी भूमिका निरंतर गौण होती जा रही है। लिहाजा कहना न होगा कि अपने ओजस्वी विचार और सर्वांगीण सरोकार के बल पर भारतीय राजनीति में उन्होंने समाजवाद की जो अलख जगाई, उसका दूसरा कोई सानी नहीं।

पूर्वांचल की राजनीति में कभी सरकारी जात तो कभी ‘मिलिटेंट कास्ट’ समझी जाने वाली भूमिहार ब्राह्मण जाति के अपार जनसरोकारों को यदि समझना हो तो राजनारायण जी के जनप्रिय व्यक्तित्व को एक आदर्श उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। कहना न होगा कि इस विरादरी में राष्ट्रीयता और जनपक्षधरता को स्वर देने वाले युगपुरुषों में अग्रगण्य प्रबल राष्ट्रीय चेतना के वाहक मंगल पांडेय, निर्भीक पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी, किसान नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती, कुशल प्रशासक श्री कृष्ण सिंह (प्रथम मुख्यमंत्री, बिहार), राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, अमर शहीद कॉ महेंद्र चौधरी, जमींदार सर गणेशदत्त सिंह की अगली कड़ी के रूप में भी राजनारायण जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और सवर्ण विरोधी मौकापरस्त और स्वार्थी राजनेताओं के मुंह पर उनका नैतिक आदर्श किसी करारा तमाचा से भी कम नहीं हैं।

यह कौन नहीं जानता कि जब भारतीय राजनीति में सुप्रसिद्ध कांग्रेसी राजनेता और तत्कालीन लौह महिला प्रधानमंत्री श्री मती इंदिरा गांधी और यूपी के मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा की तूती बोलती थी, तब अत्यंत कड़ी मेहनत और काफी मशक्कत से अपने अपार जनकौशल का परिचय देते हुए जिस तरह से लोकबन्धु राजनारायण जी ने सबको एक जगह इकठ्ठा किया और अपनी समाजवादी राजनीति के लिये अत्यंत उर्वर जमीन तैयार की, उसके लिये परवर्ती समाजवादी राजनेता सदैव उसके ऋणी रहेंगे।

जानकार बताते हैं कि तब भी उनके सहृदयी,  निष्कपट और निश्छल राजनैतिक/सामाजिक/प्रशासनिक  योगदान को महसूस कर विख्यात समाजवादी नेता मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, राममनोहर लोहिया और लोकनायक जयप्रकाश जी भी विस्मित रह गए थे और उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा किया करते थे। यही वजह है कि सबके अभिन्न सहयोग और अविस्मरणीय योगदान से उन्होंने न केवल समाजवादी राजनीति को सत्ता की बुलंदियों तक पहुंचाया, बल्कि अपने स्वच्छ और सरल व्यक्तित्व के बूते उसे हमेशा जनसरोकारों से अंतिम दम तक जोड़े रखा।

इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि समाजवादी सोच रखने वालों के बीच भी तब दिल्ली के लुटियन ज़ोन में भटकने वाले लोगों के बीच बतौर रहमदिल और सहयोगी भाव से ओतप्रोत सांसद राजनारायण जी की अच्छी खासी साख थी। जो कोई भी उनकी सरकारी कोठी पर अपने किसी काम को लेकर पहुंच जाता था, उसका मार्गदर्शन तो वे करते-करवाते ही थे, साथ में रहना-खाना फ्री होता था। किसी भी वक्त उनके दरवाजे पर जो कोई भी चला आता तो कुशलक्षेम पूछने के साथ-साथ आश्रय देने, मदद करने में वो किसी को भी, कभी भी मना नहीं करते थे। क्योंकि उनका रहन-सहन भी अत्यंत सरल और सहज था।

इसलिये राजनारायण जी गरीबों के सच्चे मसीहा थे। वो जनता में अत्यंत लोकप्रिय थे। गरीबों के बीच रहकर उनकी भलाई के लिये सोचना और फिर उसे कार्यरूप में परिणत करना उनका नैसर्गिक स्वभाव था जिसे उन्होंने ताऊम्र निभाया। सभी के लिय स्वास्थ्य नीति के वो प्रबल हिमायती थे। देशी चिकित्सा प्रणाली और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को उन्होंने खूब बढ़ावा दिया। यह विषय जनता पार्टी की घोषणा पत्र में भी उन्होंने ही शामिल करवाया था।

दो टूक कहें तो राजनारायण जी एक उदार समाजवादी नेता थे। उन्होंने जातिवाद और साम्प्रदायिकता से ऊपर उठकर पूरी मानवता के लिये बेहतर काम किया। इसलिये तमाम समकालीन नेताओं के बीच ध्रुवतारा की तरह वो चमकते रहे। शिखर समाजवादी नेताओं के बीच वो आज भी अग्रगण्य हैं। यह कड़वा सच है कि जब उनका स्वर्गवास हुआ तो उनके बैंक खाते में मात्र 1450 रूपये थे जो उनकी ईमानदारी के प्रबल  परिचायक बने। वो चुम्बकीय व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने अपनी 800 बीघे की पैतृक जमींन को भूमिहीन दलितों के बीच बाँट दिया और ताउम्र गरीबों की बेहतरी के लिये संघर्ष किया। कहना न होगा कि गरीबी उन्मूलन के अपने पवित्र उद्देश्य में वो एक हद तक सफल भी रहे।

खास बात यह कि गरीबों के लिये जीना-मरना उनका स्वभाव था। वो नौटंकीबाज नेता नहीं, बल्कि गरीबों के असली मसीहा थे। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में वाराणसी और उसके आसपास के इलाके में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई थी जिससे परेशान होकर ब्रिटिश सरकार ने उन पर 5000 रुपये का इनाम घोषित किया था। लिहाजा आजादी की 25वीं वर्षगांठ पर सन 1972 में उन्हें स्वतंत्रता संघर्ष सेनानी के सम्मानजनक ताम्रपत्र और मासिक पेंशन निधि भी नवाजा गया जिससे वो जरूरतमंदों की खुलकर मदद करते थे।




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