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“शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली हैं”

हिमांशु तिवारी

hktiwari009@gmail.com

शिक्षक दिवस के शुभ अवसर पर सबसे पहले सभी गुरुजनों को सादर प्रणाम। शिक्षक यानी की गुरु जिन्होंने हमें ज्ञान दिया, जीवन का दर्शन समझाया और हमे अपने जीवन को साकार बनाने में मदद किया, ऐसे सभी शिक्षकों को कोटी-कोटी प्रणाम। आज के दिन हमें अपनी मां को भी याद करना चाहिए और उन्हे भी प्रणाम करना चाहिए। क्योंकि मां ही हमारे जीवन की पहली और वास्तविक शिक्षिका होती है जो हमें सीखने की कला सिखाती है। दुनियां में आने पर सबसे पहले मां ही हमें उंगली पकड़कर चलना सिखाती है। ज्ञान के क, ख, ग, से रूबरू कराती है। मां को गुरु कहने का मेरा तात्पर्य उसके नि:स्वार्थ भाव से है। जो एक शिक्षक की पहली पहचान है।

महर्षी अरविंद ने शिक्षकों के संबंध में कहा है कि “शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली हैं। वे संस्कारों के जड़ों में खाद देते हैं और और अपने श्रम से सींचकर उन्हें शक्ति में निर्मित करतें हैं।” अर्थात जो लोग आज शिक्षक की भूमिका में हैं उन्हे खुश होना चाहिए की वो एक उन्नत राष्ट्र के निर्माण के लिए कार्यरत हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार कहा था कि बच्चे को जन्म मां देती है लेकिन उसे एक आदर्श जीवन देने का काम शिक्षक ही करता है और वही छात्र एक दिन उस शिक्षक की पहचान बनता है। समय बदला लेकिन शिक्षकों की समाज के प्रति भूमिका आज भी वही है जो वर्षों पहले थी। आज भी शिक्षकों का पहला कर्तव्य अपने छात्रों को उसके गुणों और अवगुणों से परिचय कराना है। जब शिक्षक अपने कर्तव्यों का ईमानदारी पूर्वक पालन करता है तो मजबूत राष्ट्र और संवेदनशील समाज का निर्माण होता है।

गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर, गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:

अर्थात गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही महेश यानी भगवान शंकर हैं, गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं ऐसे गुरु को मैं सादर प्रणाम।

संस्कृत का यह शब्द दो अक्षरों गु और रू के मिलने से बना है। ‘गु’ का अर्थ होता है ‘अंधकार’ और ‘रु’ का अर्थ है ‘प्रकाश’ अर्थात गुरु वह वयक्ति हैं जो हमें अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता हैं। मौजूदा समय में गुरु का अर्थ शिक्षक और उस्ताद से भी लगाया जाने लगा है। शिक्षकों के सम्मान में शिक्षक दिवस दुनिया भर में मनाया जाता है। कुछ देशों में इस अवसर पर अवकाश रहता है तो कुछ देशों में कामकाज होता है। भारत में शिक्षक दिवस 5 सितंबर को देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। जबकि अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस का आयोजन 5 अक्टूबर को होता है। शिक्षकों के प्रति सहयोग को बढ़ावा देने और भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शिक्षकों के महत्व के प्रति जागरूकता लाने के मकसद से इसकी शुरुआत की गई थी। थाइलैंड में हर साल 16 जनवरी को राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाया जाता है और मलेशिया में इसे 16 मई को मनाया जाता है, वहां इस खास दिन को ‘हरि गुरु’ कहते हैं।

1931 में चीन की नेशनल सेंट्रल यूनिवर्सिटी में शिक्षक दिवस मनाने की शुरूआत हुई, जिसकी चीन सरकार से 1932 में मंजूरी मिली। 1939 में कन्फ्यूशियस के जन्मदिवस, 27 अगस्त को शिक्षक दिवस घोषित किया गया लेकिन 1951 में इस घोषणा को वापस ले लिया गया। 1985 में एक बार फिर 10 सितम्बर को शिक्षक दिवस घोषित किया गया। लेकिन अब अधिकांश लोग कन्फ्यूशियस के जन्मदिवस को ही शिक्षक दिवस के रूप में मनाने के पक्ष में हैं।

वहीं, रूस में 1965 से 1994 तक अक्टूबर महीने के पहले रविवार के दिन शिक्षक दिवस मनाया जाता रहा। साल 1994 से विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर को ही मनाया जाने लगा।

ईरान में प्रोफेसर अयातुल्लाह मोर्तेजा मोतेहारी की हत्या के बाद उनकी याद में दो मई को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। तुर्की में 24 नवंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। वहां के पहले राष्ट्रपति कमाल अतातुर्क ने यह घोषणा की थी।

गुरु के प्रति सम्मान भारतीय परंपरा की पहचान है। प्राचीन काल में गुरु की आज्ञा का पालन करना शिष्य अपना परम धर्म समझते थे। उस समय शिक्षा के नाम पर गुरु अपने श्रीमुख से शिष्यों को वेदों का ज्ञान दिया करते थे और शिष्य अपने गुरु को अपने पिता से भी अधिक सम्मान देते थे। कबीर ने गुरु को भगवान से उपर दर्जा दिया है। कबीर कहते है कि  

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय | बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय ||

गुरु और भगवान दोनों आकर खड़े हो जाएँ तो पहले किसके चरण स्पर्श करें? सचमुच यह यक्ष प्रश्न है। लेकिन गुरु के चरण-स्पर्श करना ही श्रेष्ठतर है, क्योंकि वे ही हमें भगवान तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं|

समय के साथ गुरू-शिष्य को परंपरा को भी बदलाव के दौर से गुजरना पड़ा, गुरुकुल की जगह विध्यालय और विश्वविद्यालयों ने ले लिया। वेद पाठ करने वाले शिष्यों की जगह पर इतिहास भूगोल पढ़ने वाले छात्र आ गए। अध्ययन का उद्देश्य ज्ञान की प्राप्ति के साथ साथ धनार्जन भी हो गया है। इसकी बड़ी वजह हमारी रोजमर्जा की भौतिकवादी जरूरतें है। शिक्षा से हमारा आशय है ज्ञान, ज्ञान का आकांक्षी होता है शिक्षार्थी यानी की छात्र और इसे उपलब्ध कराता है शिक्षक। गौर से देखें तो तीनों परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। एक के बगैर दूसरे का कोई अस्तित्व ही नहीं है। शिक्षा विकास की कुंजी है। प्राचीनकाल में इस काम को गुरु किया करते थे अब इसे शिक्षक कर रहे हैं।

शिक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाली प्रबंधन इकाई के रूप में प्रशासन नाम की नई चीज जुड़ने से शिक्षा ने व्यावसायिक रूप धारण कर लिया है। भारत में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। लेकिन आज भी हम सर्व स्वीकार्य शिक्षा व्यवस्था कायम नहीं कर पाए हैं। देश में शिक्षा, शिक्षक और छात्र तीनों की स्थिति चिंता जनक है। शिक्षक दिवस के मौके पर शिक्षकों का सम्मान कर देने मात्र से ही गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाह नहीं हो जाता है। आधुनिक समय में हमें इस गुरु की गरिमा को समझने की आवश्यक्ता है।

 




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