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जवानों की शिकायत में कितनी सच्चाई !

himanshu tiwari

हिमांशु तिवारी (वरिष्ठ पत्रकार)

Hktiwari009@gmail.com

पहले बीएसएफ, फिर सीआरपीएफ, और अब आर्मी के जवान का वीडियो… ये सोचने पर मजबूर करता है कि हमारे जवान किन हलातों में देश की सेवा कर रहे है। क्या वाकई सरकार अपनी जिम्मेदारियों से आंखें मूंदे बैठी है। क्या सरकारी दावे महज कागजी है? कोई न कोई तो कारण होगा जो ऐसे हालात बन रहे हैं। आर्मी के जवान यज्ञ प्रताप सिंह ने वीडियो शेयर करते हुए सेना के भीतर सेवादारी प्रणाली का जिक्र किया। यज्ञ का आरोप है कि सेना के अधिकारी जवानों से अपने जूते तक साफ करवाते हैं। तो इससे पहले सीआरपीएफ जवान जीत सिंह ने सीआरपीएफ जवानों को आर्मी जैसी सुविधाएं देने की मांग अपने वीडियो में की थी। लेकिन अपने अधिकारियों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने की शुरुआत बीएसएफ जवान तेज बहादुर ने की थी। इन सभी जवानों के शब्द भले ही अलग हो लेकिन इनका दर्द एक है, वो ये कि इनके साथ नाइंसाफी हो रही है। विवाद बढ़ा तो सरकार और आला अधिकारियों ने मामले की जांच के आदेश दे दिए। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने यहां तक कहा कि पूरे मामले की जांच होनी चाहिए। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने एक बार फिर भरोसा दिया है कि जवानों का वेलफेयर मोदी सरकार की पहली प्राथमिकता है। वहीं हंसराज अहीर ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि सेना हो या अर्ध सैनिक बल सभी के साथ एक जैसा व्यवहार होना चाहिए।

अगर, भारतीय नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक यानि कैग की रिपोर्ट पर नजर डाले तो जवानों की बातों में सच्चाई नजर आती है। 2010 की अपनी रिपोर्ट में कैग में चौकाने वाले खुलासे किए थे। संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कैग ने सप्लाई चेन मैनेजमेंट पर कई सवाल खड़े किए थे। इसके अलावा कैग ने दो और महत्वपूर्ण बातें कही थी। जिसमें सेना के उत्तरी और पश्चिमी कमान के कुछ हिस्सों में खाद्य पदार्थों को अनुमानित भंडारण अवधि के खत्म होने के बाद भी 6 महीने से 28 महीने आगे तक प्रयोग में लाए जाने की बात सामने आई थी। इसके साथ ही राशन की गुणवत्ता, मात्रा और स्वाद के मामले में भी हालात कमी का खुलासा हुआ था। सैनिकों को दी जाने वाली थाली किसी भी तरह से उनके उपयुक्त नहीं है। कैग ने एक बार फिर 2016 में संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में यही बातें दोहराई। कैग ने कहा कि 68 फीसदी सैनिकों ने निचले स्तर का भोजन मिलने की शिकायत की है। कैग की रिपोर्ट पर सवाल खड़े करना राजनीतिक दलों की फितरत हो सकती है लेकिन आम आदमी के लिए कैग की रिपोर्ट फाइनल है। इस पर कोई सावल नहीं उठाया जा सकता है। यानी की साफ है कि सरकार की तरफ से कमी रही है। जिसे हर हाल में ठीक करने की जरूरत है।

राजनीतिक मंचों से जवानों की बात करना अलग बात है और हकीकत में उनके लिए ठोस काम करना दूसरी बात है। आज जरूरत है कि सीमा पर देश के लिए शहीद होने वाले जवानों के लिए ईमानदारी से काम करने की जरूरत है। आज विपक्ष जवानों की शहादत पर हांगामा कर रहा है, कल जो सत्ता में बैठे है वो हंगामा कर रहे थे। क्या सिर्फ हंगामा करने से जवानों का भला हो जाएगा। अगर हां तो सही है और ना तो सही कदम उठाने की जरूरत है। इसी मामले पर गृह मंत्रालय ने 2012 में एक रिपोर्ट जारी की थी… जिसमें इस बात का खुलासा हुआ था कि 2010-12 में सुरक्षा बलों के 35 हजार 4 सौ 73 जवान और दूसरे कर्मियों ने वीआरएस ले लिया या फिर अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। यानी औसतन हर रोज करीब 50 जवान नौकरी छोड़ देते हैं। इन आकड़ों को देखने के बाद कहा जा सकता है कि जवानों की बातों में सच्चाई है। अगर समय रहते इसे ठीक नहीं किया गया तो देश के लिए जान देने वाले लोगों नहीं मिलेंगे।




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