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रहम करो ‘प्रभु’

हिमांशु तिवारी

hktiwari009@gmail.com  

 

अगस्त का महीना मोदी सरकार के लिए भारी पड़ता जा रहा है एक तरफ उत्तर प्रदेश और झारखंड़ में बच्चों की मौत तो वहीं दूसरी तरफ इस महीने में एक के बाद एक तीन रेल हादसों ने विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया है। रेलवे में सुधार और सुरक्षा के नाम पर सरकारी दावों की पोल परत दर परत खुलती जा रही है। अगर आम आदमी से आज यह सवाल पूछा जाए कि उसे रेलवे से क्या चाहिए तो अधिकांश लोग यही कहेंगे की रेलवे उन्हे सुरक्षित उनके मंजिल तक पहुंचा दे। सच कहा जाए तो यात्रियों के इस मांग पर भारतीय रेल प्रशासन के पास कोई ठोस उत्तर नहीं है। दरअसल जिस तरह से रेलवे के बाबुओं ने मुनाफा कमाने के लिए तरह तरह के नियम बनाए उससे आम आदमी परेशान है। जो नियम आज लागू किया गया वह कुछ दिन बाद बदल जाता है और उसकी जगह पर एक नया नियम आ जाता है लेकिन रेल गाड़ियों में यात्रियों को मिलने वाली सुविधाओं में कोई विशेष फर्क नजर नहीं आता है, ना ही रेल यात्रा के दौरान इस बात की गारंटी दी जाती है कि यात्री सही सलामत अपने गंतव्य तक पहुंच जाएगा। लेट लतीफी की बात तो छोड़ तो छोड़ ही दीजिए रेलवे जान की गारंटी भी देने की स्थिति में नहीं है।

हाल के हादसों से दुखी होकर रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इस्तीफा देने की पेशकश की है जो इस बात को दर्शाता है कि मंत्री खुद को लाचार महसूस कर रहें हैं। जो वायदे उन्होंने देश की जनता से बजट के माध्यम से किया था उसे वो पूरा नहीं कर पा रहें हैं। विपक्ष इसे राजनीतिक जीत के तौर पर देख सकता है लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सुरेश प्रभु इतने बेबस क्यों हो गए। रेल बजट में सुरेश प्रभु ने मिशन जीरो एक्सिडेंट की बात किया था। जिसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा कोष का गठन भी किया गया था। जिसका मकसद एक लाख करोड़ रुपये की मदद से पांच सालों में रेलवे में होने वाले हादसों को कम करना था। लेकिन रेलवे के पास फिलहाल कोई ऐसा सिस्टम नहीं है जो इन हासदों के रोक सके और ट्रेन पटरियों से ना उतरे। मौजूदा समय में रेलवे के 90 फीसदी कोच सुरक्षित नहीं है और इन्हे बदलने के लिए रेलवे को बड़े निवेश की आवश्यक्ता है ताकि नई तकनीक का इस्तेमाल किया जा सके। इन कोचों के अलावा रेलवे ट्रैक्स की स्थिति भी कम भयावह नहीं है। कई पुल जर्जर हालात में है जिन्हे हर हाल में ठीक करना आवश्यक है। यानी कुल मिलाकर रेलवे को इस काम के लिए पैसा और समय दोनों चाहिए जो फिलहाल सरकार के पास नहीं है। पैसे का थोड़ा बहुत इंतजाम अगर हो भी जाता है तो आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से सरकार के पास समय ना के बराबर बचा हुआ है। ऐसे में रेलमंत्री का इस्तीफा एक कारगर कदम हो सकता है। वैसे भी विपक्ष लगातार लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण देकर सत्ता पक्ष पर नैतिकता की दुहाई दे ही रहा है। विपक्ष के हमलों के कमतर करने और आम जनता में साकारात्मक संदेश देने के लिए सरकार ने पहले ही रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को बदल दिया है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या सुरेश प्रभु के इस्तीफा देने मात्र से रेलवे के हादसे थम जाएगे अगर हां तो सुरेश प्रभु का इस्तीफा तुरंत ले लेना चाहिए। लेकिन, ऐसा नहीं है। इस्तीफा देना और लेना दोनों ही नैतिक कम राजनीतिक कारण ज्यादा है। विपक्ष सत्ता पक्ष पर दबाव बनाने के लिए इस्तीफे की मांग करता है और सरकार की छवि को सुधारने के लिए मंत्री इस्तीफा देते हैं। रेलवे की मौजूदा स्थिति के लिए सुरेश प्रभु को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह से सही नहीं होगा. रेलवे की खस्ताहाल स्थिति के लिए पूर्व की सरकारें भी कम दोषी नहीं हैं। दरअसल रेलवे को लोकलुभावन वादों ने बर्बाद कर दिया है। पिछले सात दशक में रेलवे का विस्तार तो हुआ लेकिन ट्रैक और कोच के आधुनिकरण के नाम पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। भारतीय रेल उन्ही पटरियों पर दौड़ते थक गई है। मौजूदा समय में जो हालात है उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि रेलवे में बड़े स्तर पर सुधार की आवश्यक्ता है और इसके लिए पैसा और समय दोनों की जरूरत है तभी जाकर रेल यात्रा भय मुक्त हो पाएगा।




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