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पाप इंसान करे और कसूर साल का

हर साल साल के अंत में मैं यह देखता हूं, जब पुराना साल विदा लेने को और नया साल दस्तक देने को होता है, हम सेंटी टाइप हो जाते हैं। भावनाओं को ऐसे निकालकर बाहर रख देते हैं कि बस पूछो ही मत। पुराने साल से साल भर किए पापों की माफी मांगते हैं। नए साल पर कुछ संकल्प लेते हैं। जबकि यह हर किसी को पता रहता है कि जिंदगी को चलना उसी ढर्रे पर है, पर क्या करें- दिल नहीं मानता।

ये दिल का भी बड़ा लोचा है। दिल कभी कुछ तो कभी कुछ भी नहीं कहता। पर ख्याल इसका रखना ही पड़ता है। न रखेंगे तो यह कभी भी बिदक लेगा। जबकि दुनिया-समाज में आधे से अधिक कांड इस दिल के कारण ही होते हैं। अब जब हर किस्म का बोझ दिल पर डाले रहेंगे तो भला वो क्यों नहीं बैठेगा। आखिर दिल ही तो है।

सच कहता हूं, मैंने न गुजरते, न आते साल को कभी दिल से नहीं लगाया। जाने वाले का इस्तकबाल भी उतनी ही शिद्दत से किया, जितना कि आने वाले का। सालों का आना-जाना तो, जब तक जिंदगी है, लगा ही रहेगा। फिर क्यों हम गुजरते और आते साल के प्रति इतना सेंटी होएं। जो बीत गई सो बात गई। ऐसे लोग भी मैंने खूब देखे हैं, जो अपने कांडों, अपने पापों का जिम्मा साल पर डाल देते हैं।

क्यों भई? जब कांड कर रहे थे तब क्या साल से पूछा था? मतलब- पाप इंसान करे और अपराधी साल को यह कहते हुए बना डाले कि ‘बीता साल कुछ अच्छा नहीं रहा।’ अमां, अच्छा तो तुम्हारे आचरण की वजह से नहीं रहा। साल को क्यों दोष देना। साल तो सभी एक जैसे ही होते हैं, बस आपने ही साल में कुछ अलग कर दिया।

नए साल पर तरह-तरह के संकल्प लेने वाले भी बड़े अजीब प्राणी होते हैं। दुनिया भर के संकल्प तो यों ले लेते हैं मानो सब निभा ही डालेंगे। पर, एक तारीख या हफ्ता बीतते ही सारे संकल्प चूं-चूं का मुरब्बा साबित होते हैं। वही ऊंची दुकान फीका पकवान वाली कहावत। अब तो लोग सोशल मीडिया को छोड़ने का भी अतिरिक्त संकल्प लेने लगे हैं!

लेकिन निगाहें फिर भी मोबाइल के नोटिफिकेशन पर ही टिकी रहती हैं। सोशल मीडिया की लत से इतना आसान नहीं है पिंड छुड़ा पाना। इसकी पैठ जितनी दिमाग में है, उतनी ही दिल में भी। जिन्हें जो छोड़ना या पकड़ना हो, वे वो करें। उनकी मर्जी। लेकिन मैं मेरे गुजरते और आते साल को अच्छा ही कहूं, मानूंगा। जो भी अच्छा या बुरा है, वो मेरा है, साल का नहीं।

साल तो बस एक माध्यम भर है मेरे बीच। हां, संकल्प मैं लेता नहीं। क्योंकि मुझसे ये निभाए नहीं जाते। दिमाग और जिंदगी पर एक बोझ टाइप लगते हैं। तमन्ना बस इतनी जरूर रहती है कि जैसे मैं पिछले साल बिगड़ा रहा, आने वाले साल में भी ऐसा ही रहूं। क्योंकि- मेरा मानना है- दुनिया को बिगड़कर ही बेहतर समझा जा सकता है। सुधरे रहकर नहीं। अगर बिगड़ेंगे तो ही बेहतर का ज्ञान होगा।




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